सोवियत संघ के नेता जोसेफ स्टालिन ने हिटलर के फील्ड मार्शल फ्रेडरिक पॉलस (Friedrich Paulus) को जीवनदान दिया था और उन्हें युद्धबंदी के रूप में सुरक्षित रखा था। पॉलस ने स्टालिनग्राद की लड़ाई में सोवियत सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था
आत्मसमर्पण: जनवरी 1943 में स्टालिनग्राद में जर्मन छठी सेना की हार के बाद उन्होंने हिटलर के आदेश के विरुद्ध आत्मसमर्पण किया।
स्टालिन ने उन्हें मौत की सजा देने के बजाय सुरक्षित रखा और बाद में सोवियत संघ में उन्हें रहने की अनुमति दी।
पॉलस ने बाद में युद्ध के बाद नूरेमबर्ग मुकदमों में नाजी नेतृत्व के खिलाफ गवाही भी दी।
जन्म: 23 सितंबर 1890 को जर्मनी के ब्रेइटेनाउ में हुआ था।
सेना में प्रवेश: मारबर्ग विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई के बाद, वे 1910 में जर्मन सेना में शामिल हुए।
उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पश्चिमी और पूर्वी मोर्चों पर अपनी सेवाएं दीं।
1942 में उन्हें जर्मन छठी सेना का कमांडर बनाया गया और सोवियत संघ के स्टालिनग्राद शहर पर कब्जा करने का जिम्मा सौंपा गया।
नवंबर 1942 में सोवियत लाल सेना ने एक भारी पलटवार कर जर्मन सेना को पूरी तरह घेर लिया।
हिटलर ने उन्हें पद से पीछे हटने से मना किया और जनवरी 1943 में उन्हें फील्ड मार्शल बना दिया, ताकि वे आत्महत्या कर लें या अंतिम सांस तक लड़ें।
आत्मसमर्पण: हिटलर के आदेश की अवहेलना करते हुए पॉलस ने 31 जनवरी से 2 फरवरी 1943 के बीच सोवियत सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
बाद का जीवन और मृत्यु
युद्ध के बाद वे सोवियत संघ के कैदी रहे। इस दौरान उन्होंने नाजी शासन और हिटलर की नीतियों की खुलकर आलोचना की।
1953 में उन्हें रिहा कर दिया गया, जिसके बाद वे पूर्वी जर्मनी में बस गए। 1 फरवरी 1957 को ड्रेसडेन में कैंसर के कारण उनका निधन हो












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