जल के बिना न तो प्रकृति का संतुलन बना रह सकता है और न ही प्राणियों का अस्तित्व संभव है_श्री विजय शुक्ला उत्तरप्रदेश

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जलं धारयति पृथिवीं, जलं पुष्णाति जीवनम्।
जल संरक्षणं कुर्यात्, जलं रक्षतु सर्वदा॥

भावार्थ:
यह श्लोक ‘जल’ के महत्व और उसके संरक्षण की आवश्यकता को स्पष्ट करता है।

इसमें कहा गया है कि जल ही पृथ्वी को धारण करता है और समस्त जीव-जगत के जीवन का पोषण करता है। जल के बिना न तो प्रकृति का संतुलन बना रह सकता है और न ही प्राणियों का अस्तित्व संभव है।

इसलिए प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह जल का विवेकपूर्ण उपयोग करे, उसका अपव्यय न होने दे तथा जल स्रोतों की रक्षा करे।

जल संरक्षण केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित और समृद्ध भविष्य के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।

अतः हमें सदैव जल की रक्षा और संरक्षण का संकल्प लेना चाहिए।

जय श्री कृष्णा

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