योगदिवस विशेष
*योगमार्ग के विघ्न *
व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादाऽऽलस्याऽविरतिभ्रान्तिदर्शनाऽलब्धभूमिकत्वाऽनवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तराया:।। 30।।
चल चित्तवृत्तियों के सहवासी विघ्न नौ हैं
शत्रु योगमार्ग के विक्षेप बतलाते हैं।
व्याधि, अकर्मण्यता, प्रमाद, संशय के साथ
आलस्य, अलब्धभूमिकत्व को गिनाते हैं।
अविरति, भ्रान्ति, अनवस्थितत्व कहे जाते
योगसाधना से दूर साधक को ले जाते हैं।
ईश्वर का ध्यान करो, धैर्य धरो, डरो मत
सोत्साह आगे बढ़ो, उपाय सुझाते हैं।।
सूत्रार्थ :- व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, अनवस्थितत्व – ये चित्त के नौ विक्षेप ही योगमार्ग के विघ्न हैं।
*योग-साधना में बाधक पाँच दूसरे विक्षेपों का कथन *
दु:खदौर्मनस्यांगमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुव:।। 31।।
दु:ख,दौर्मनस्य,अंगकम्प, श्वास और प्रश्वास
पाँच सहयोगी अन्तराय माने जाते हैं।
दैहिक, दैविक औ भौतिक ये तीन ताप
दु:ख कहलाते जो कि चित्त को सताते हैं।
इच्छा जो न पूरी होती मानसिक क्षोभ होता
यही क्षोभ ‘दौर्मनस्य’ होता बतलाते हैं।
‘अंगकम्प’ ‘श्वास’ और ‘प्रश्वास’ अनियंत्रित ये
सभी योग-साधना में विघ्न बने आते हैं।।
सूत्रार्थ :- दुख, दौर्मनस्य, अंगकम्पन, श्वास और प्रश्वास – ये पूर्वोक्त नौ विक्षेपों के साथी उपविक्षेप हैं।
*विघ्न-विनाश के उपाय *
तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्वाभ्यास:।।32।।
योग के विरोधी इन विघ्नों के विनाश हेतु
एकतत्त्व का अभ्यास करना ही चाहिए।
एक वह ईश्वर है, वही है महान एक
ध्यान उसका प्रधान धरना ही चाहिए।
किसी एक वस्तु पर चित्त को एकाग्र कर
चित्तवृत्ति चपलता रहना ही चाहिए।
ओम् का उच्चार कर मान उपचार उसे
साधक को योग में उतरना ही चाहिए।।
सूत्रार्थ :- पूर्वोक्त विक्षेपों और उपविक्षेपों को दूर करने के लिए चित्तवृत्तियों के निरोध के लिए अभिमत किसी एक तत्व का निष्ठापूर्वक निरन्तर अभ्यास करना चाहिए।
*चित्त को प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्न रखने के उपाय *
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदु:खपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ।।33।।
क्रोध, राग-द्वेष, दम्भ, ईर्ष्या न सताये, अस्तु
शान्ति हेतु चार उपचार बतलाते हैं।
सुखियों से प्रीति मैत्री-भावना बनाये रहो
दुखियों पै दया-भाव रखना सुझाते हैं।
उन्हें देखकर के प्रसन्न हो अतीव, जो कि
पुण्यव्रतधारी, सदाचारी गिने जाते हैं।
उनकी उपेक्षा करो, ग्लानि-भावना न भरो
जो हैं पापाचारी दुष्ट जीवन बिताते हैं।।
सूत्रार्थ :- सुखियों से ईर्ष्या-द्वेषादि न रख कर मित्रता के भाव रखना, दुखियों के प्रति करुणा के भाव रखना, पुण्यकर्मियों को देखकर हार्दिक प्रसन्नता प्रकट करना और पापियों के प्रति उदासीनता के भाव रखने से चित्त प्रसन्न और निर्मल रहता है।
चित्त की स्थिरता का उपाय – प्राणायाम
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य।। 34।।
मल तन-मन के हैं रोग-शोककारी, अस्तु
साधना में बडे़ भारी विघ्न बने आते हैं।
इनको मिटाओ, चित्त स्थिर बनाओ, अस्तु
प्राणायाम के उपाय सुन्दर सुझाते हैं।
प्राणवायु खींचो, रोको, बाहर निकालो, फिर
ऐसा करने से मल सारे जल जाते हैं।
बढ़ती एकाग्रता, विमल तन-मन होते
प्राणायाम दृढ़ योग-भूमि को बनाते हैं।।
सूत्रार्थ :- बारम्बार नासिका मार्ग से वायु को बाहर निकालने तथा यथाशक्ति बाहर रोके रखने के अभ्यास से भी चित्त शान्त और निर्मल होता है।
*मन को स्थिर करने के अन्य साधन *
विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनस: स्थितिनिबन्धिनी ।।35।।
धीर-धीरे साधना में होता है विकास जब
धारणा की सिद्धि दिव्य अनुभूति लाती है।
‘विषयवती प्रवृत्ति’ कहता है शास्त्र इसे
जोकि सूक्ष्म विषयों के दर्शन कराती है।
दिव्य, शब्द, रूप, रस, गन्ध जो अलौकिक हैं
अनुभूत साक्षात् होते, सिद्धि आती है।
मिलता बढ़ावा इन सिद्धियों से साधक को
स्थिरता आती, गति और बढ़ जाती है।।
सूत्रार्थ :- गन्ध, रस, रूप, शब्द, स्पर्श आदि विषयों का साक्षात्कार करने वाली वृत्तियाँ भी उत्पन्न होकर मन की स्थिरता का हेतु बनती हैं।
मन:स्थैर्य का अन्य उपाय-ज्योतिष्मती प्रवृत्ति
विशोका वा ज्योतिष्मती।। 36।।
हृदय-कमल मध्य चित्त जो एकाग्र हुआ
उर:मध्य दिव्य ज्योति की छटा सुहाती है।
आत्मिक प्रकाश ज्योति-जाल छिटकाती यह
‘ ज्योतिष्मती प्रवृत्ति’ दिव्य कही जाती है।
शुद्ध सात्विक विशोका आनन्दमयी प्रवृत्ति
स्थिरता अखण्ड चित्त में जगाती है।
सात्विक प्रवृत्ति शुद्ध आनन्द अखण्ड लिए
योग-सिद्धि हेतु दिव्य भूमिका बनाती है।।
सूत्रार्थ :- अभ्यास करते-करते यदि साधक को शोक-रहित दिव्यज्योति स्वरूपा प्रवृत्ति का साक्षात्कार हो जाये, तो वह भी चित्त को स्थिर करने वाली होती है।
*ध्यान द्वारा मन को स्थिर करने की सम्मति *
यथाभिमतध्यानाद्वा।। 39।।
ध्यान-वस्तु जो भी अभीष्ट हो, जिसमें रुचि जग जाये।
साधक मन-स्थैर्य हेतु, उस साधन को अपनाये।।
स्थिरता-अभ्यास अगर परिपक्व पूर्णता पायेगा।
मन का केन्द्रीकरण जहाँ भी चाहे, तब हो जायेगा।।
सूत्रार्थ :- पूर्व कथित ध्यान साधनों के अतिरिक्त भी मनपसन्द वस्तु को ध्यान का विषय बनाकर चित्त को स्थिर किया जा सकता है।
*मन की स्थिरता के पूर्ण परिपक्व हो जाने पर साधक की स्थिति *
परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकार: ।।40।।
एकाग्रता चित्त की करते-करते जब होता अभ्यास।
हो जाती परिपूर्ण और हो जाता चरम विकास।।
तब साधक का मन पर होता है पूरा अधिकार।
वशीकार नामक चित्त स्थिति का होता विस्तार।।
चाहे हो परमाणु सूक्ष्मतम या अनन्त आकाश।
दोनों में मन:स्थैर्य का होता पूर्ण विकास।।
स्थिरता की चरमस्थिति यह वशीकार कहलाता।
चित्त-स्थिरता हेतु यहीं अभ्यास पूर्ण हो जाता।।
सूत्रार्थ : पूर्वोक्त उपायों द्वारा पूर्ण स्थिरता को प्राप्त हुआ चित्त सूक्ष्मतम पदार्थ अणु-परमाणु से लेकर परम महत् व्यापक आकाशपर्यन्त एकाग्र करने की ‘ वशीकार’ ‘नामक सामर्थ्य से परिपूर्ण हो जाता है।।
वेदभाष्यकार डॉ देवीसहाय पाण्डेय अयोध्या
















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