ईश्वर के नाम-जप और स्वरूप का चिन्तन करने से साधक के साधना-पथ के विघ्न दूर होते हैं और आत्मज्ञान का आगमन होता है_डा देवीसहाय पाण्डे अयोध्या

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योगदिवस विशेष

*साधना में ईश्वर तत्व का महत्व *

ईश्वरप्रणिधानाद्वा।। 23।।

ईश्वर भी योग के प्रयोग में सहायक है
साधना में वह पतवार बन जाता है।
छल छोड़ नाता जोड़ शरण में जाता जो है
शरण में आये को सुशीघ्र अपनाता है।
सर्व शक्तिमान वह ईश्वर महान, इच्छा-
मात्र से ही सिद्धि देता, विघ्न को मिटाता है।
निर्बीज समाधि औ समाधिजन्य मुक्ति-फल
सच्चा ईश-भक्त अनायास शीघ्र पाता है।।

सूत्रार्थ : पूर्वोक्त अधिमात्र उपाय एवं अधिमात्र तीव्रसंवेग के अतिरिक्त ईश्वर-प्रणिधान से सभी शीघ्रतम समाधि का लाभ होता है।

*ईश्वर का स्वरूप *

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:।। 24।।

पुरुष प्रकृति साहचर्यवश क्लेश, कर्म
कर्म-फल, वासना से युक्त दिखलाता है।
किन्तु क्लेश, कर्म, कर्म-फल, वासनाविमुक्त
पुरुष विशेष वही ईश्वर कहाता है।
तीनों काल में न दु:ख दोष का है लेश जहाँ
सर्वशक्तिमान् एकरूप माना जाता है।
उसके बराबर या उससे बड़ा न कोई
इच्छामात्र से ही मुक्ति-फल का प्रदाता है।।

सूत्रार्थ : क्लेश, कर्म, कर्मों के फल और और वासनाओं से असम्बद्ध, अन्य पुरुषों से विशिष्ट (उत्कृष्ट) पुरुषोत्तम ईश्वर है।

*ईश्वर ज्ञान की पराकाष्ठा है *

तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्।। 25।।

ईश्वर सर्वज्ञ सारे ज्ञान का निधान वह
उससे बड़ा न कोई अन्य दृष्टि आता है।
ज्ञान में, दया में अन्य उस-सा न दृश्यमान
उस-सा महान न जहान में दिखाता है।
दु:खितों के प्रति दयाभाव उसका स्वभाव
कष्ट से उबार लेना उसे अति भाता है।
ध्यान करो उसी शक्तिमान का, कल्याण हेतु
वही सिद्धिदाता, मुक्तिदाता है, विधाता है।।

सूत्रार्थ : उस ईश्वर में सर्वज्ञता का मूलकारण ज्ञान अपनी पराकाष्ठा पर है।

*ईश्वर का वास्तविक नाम *

तस्य वाचक: प्रणव:।। 27।।

ओम् ईश का नाम है, कहते वेद पुकार।
उसके सुमिरन मनन से, होता है उद्धार।।
सिद्धि साधना में मिले, बनें ईश अनुकूल।
विघ्न नष्ट होते सकल, मिटते पथ के शूल।।

सूत्रार्थ : पूर्वोक्त ईश्वर के नाम का बोधक शब्द ओम् है।

*ओम् नाम-जाप की प्रयोग-विधि।।

तज्जपस्तदर्थभावनम्।। 28।।

ओम् नाम का जाप कर, करो अर्थ का ध्यान।
ऐसा करने से सदा, होता है कल्याण।।
ईश्वर के गुण का स्मरण करिये बारंबार।
इससे अद्भुत चेतना का होगा संचार।।
होगा सकरुण ईश वह, होंगे दूर विकार।
खुल जायेगा शीघ्र ही योगसिद्धि का द्वार।।

सूत्रार्थ :- उस परमेश्वर के आदि मुख्य नाम ओम् का जप करें और उसके अर्थरूप परमेश्वर के सिद्धिदायक सर्वशक्तिमान् स्वरूप का अनवरत चिन्तन करें।

*ईश्वर के नाम-जप और स्वरूप-चिन्तन का फल *

तत: प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च।। 29।।

ईश्वर के प्रणिधान के, हैं ये लाभ महान।
होते विघ्न विनष्ट सब, होता आतम ज्ञान।।
अविद्यादि जो क्लेश हैं, होता उनका नाश।
पाते हैं कैवल्यपाद, साधक बिना प्रयास।।

सूत्रार्थ :- ईश्वर के नाम-जप और स्वरूप का चिन्तन करने से साधक के साधना-पथ के विघ्न दूर होते हैं और आत्मज्ञान का आगमन होता है।

 - डॉ देवीसहाय पाण्डेय 'दीप'

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