वेदों की जप, तप, व्रत की मंत्रों की तथा मंत्र प्रदान करने वाले गुरु की निंदा करते है वे अन्धकूप नरक को प्राप्त होते है।

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श्रीब्रह्मवैवर्त पुराण
4 श्रीकृष्णजन्मखण्ड अध्याय -40

भूदेवान्ब्राह्मणाश्चैव स्वागुरुं च पतिव्रता:।
पति भिक्षु ब्रह्मचारि श्रृष्टिबीजान्सुरांस्थता।।134
शिवं सुराणां प्रवरं दुर्गां लक्ष्मीं सरस्वतींम।
गीतां च तुलसीं गंगां वेदांश्च वेदमातरम।।137
व्रतं तपस्यां पूजां च मंत्रम् मंत्रप्रदं गुरूम।
ते पच्यन्त्तेsन्धकूपे वै चायुषोsर्धं विधेरहो।।138

जो मनुष्य भगवान श्री हरि विष्णु जी की, भगवान सदा शिव की तथा भगवान श्रीहरि विष्णु और शिव के भक्तों की , जगत सृष्टा ब्रह्मा जी की वेदपाठी ब्राह्मण की पतिव्रता स्त्री की, साधु संन्यासी की ब्रह्मचारी की सृष्टि बीज रूपी स्त्री की , देवगण की , देवी दुर्गा की, देवी लक्ष्मी की सरस्वती की, गीता की, तुलसी की वेदमाता सावित्री की, वेदों की जप, तप, व्रत की मंत्रों की तथा मंत्र प्रदान करने वाले गुरु की तथा निंदा करते है वे अन्धकूप नरक को प्राप्त होते है।

            श्रीब्रह्मवैवर्त पुराण 
4 श्रीकृष्णजन्मखण्ड अध्याय -40
     श्लोक -134,137,138
            
       देव ब्रत चतुर्वेदी पन्ना (मप्र)

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