आज का दिन दोबारा वापस लौटकर नहीं आएगा। हरेक दिन जीवन में एक ही बार मिलता है। यह बात मुझे बहुत देर से समझ में आई। जो हम आज अभी कर सकते हैं, वह कल नहीं कर पायेंगे। जो कार्य भविष्य में करना है, वह अभी करो। जो कार्य आज करना है, वह इसी समय अभी करो। इस विषय पर मैं शास्त्रों में से प्रमाण दे सकता हूँ। यह हमारे शास्त्रों का आदेश है।
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परमात्मा को पूर्ण-समर्पण तत्काल अभी और इसी समय अपरिहार्य और अत्यावश्यक है — लेकिन यह फलीभूत कैसे हो ? इस जीवन का अवशेष अति अति अल्प है। मेरा उच्चतम लक्ष्य परमात्मा को पूर्ण समर्पण है। आज अभी इसी समय से वह करना होगा, क्योंकि यह अंतिम अवसर है —
“क्षणभंगुर – जीवन की कलिका, कल प्रातः को जाने खिली न खिली।
मलयाचल की शुचि शीतल मन्द, सुगन्ध समीर मिली न मिली।
कलि काल कुठार लिए फिरता, तन नम्र से चोट झिली न झिली।
कहले हरिः नाम अरी रसना, फिर अन्त समय में हिली न हिली॥” (कवि: नम्र)
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“नलिनी-दल-गत-जलमति तरलम्। तद्वज्-जीवितमतिशय-चपलम्॥
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तम्। लोकं शोक-हतं च समस्तम्॥” (मोहमुद्गर)
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श्रीमद्भगवद्गीता व उपनिषदों से अनेक मंत्र अपनी बात के समर्थन में उद्धृत कर सकता हूँ, लेकिन उनकी आवश्यकता नहीं है। अनेक वर्षों की कठोर साधना व कठिन श्रम से मैंने स्वयं को प्रशिक्षित किया है — परमब्रह्म परमात्मा की उपासना के लिए। उसी को व्यवहार रूप में चरितार्थ करना होगा। कमियाँ अनेक हैं, लेकिन वे सब स्वयं के व्यक्तित्व में हैं। वे सब दूर की जा सकती हैं। स्वयं के आत्म-बल और दृढ़ संकल्प को पुनर्जागृत करना होगा। समय अधिक नहीं बचा है, इसका आभास हो रहा है। परमशिव की अपार कृपा नुझ पर है यही एकमात्र सहारा है। वे ही पुरुषोत्तम हैं जिनकी स्पष्ट अनुभूति मुझे हो रही है —
“ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥”
“अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥१५:२॥”
“न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥१५:३॥”
“ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥”
“निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥”
“न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥” (श्रीमद्भगवद्गीता)
यहीं पर भगवान को पूर्ण समर्पित होना है। ॐ तत् सत् ॥
कृपा शंकर
१७ मई २०२६
आज का दिन दोबारा वापस लौटकर नहीं आएगा _कृपा शंकर
















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