महर्षि धोंडो केशव कर्वे का बचपन — पैदल-पैदल स्कूल
1. गरीब घर के बेटे
- जन्म: 18 अप्रैल 1858, शेरावली गाँव, रत्नागिरी जिला, महाराष्ट्र
- पिता केशव बापुन्ना कर्वे — गरीब चित्पावन ब्राह्मण परिवार
- घर में पैसा नहीं था, लेकिन पढ़ने का जुनून बहुत था
2. मीलों पैदल चलकर स्कूल
उस समय गाँव में स्कूल नहीं था। धोंडो केशव हर दिन 5-6 मील पैदल चलकर पास के शहर के स्कूल जाते थे।
- धूप हो या बारिश — कई बार पैरों में चप्पल भी नहीं होती थी
- भूखे पेट भी स्कूल जाते, क्योंकि उनका मानना था कि शिक्षा ही गरीबी से मुक्ति का रास्ता है

3. संघर्ष से सफलता तक
- वही पैदल चलकर की गई पढ़ाई उन्हें 1884 में एल्फिन्स्टन कॉलेज, मुंबई से गणित में स्नातक तक ले गई
- बाद में फर्ग्यूसन कॉलेज में गणित के प्रोफेसर बने
- जो खुद मीलों पैदल चलकर पढ़ा, उसी ने आगे चलकर लाखों बेटियों के लिए स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय बनवाए
4. उनके अपने शब्दों में
अपनी आत्मकथा ‘Looking Back’ में उन्होंने लिखा — बचपन की तंगी ने ही उन्हें सिखाया कि शिक्षा के बिना समाज नहीं बदलेगा। इसलिए जीवन भर दूसरों के लिए शिक्षा का रास्ता आसान बनाने में लगे रहे।
पैरों से चल-चलकर स्कूल जाने वाला लड़का ही आगे “महर्षि” बना, और लाखों बेटियों को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया
कहते हैं न — संघर्ष ही इंसान को बड़ा बनाता है!
महर्षि धोंडो केशव कर्वे और आइंस्टीन की मुलाकात
1. कब और कहाँ हुई मुलाकात?
- साल: 1929 — उस समय महर्षि कर्वे 71 साल के थे
- जगह: बर्लिन, जर्मनी
- मौका: महर्षि कर्वे 1929 में यूरोप, अमेरिका और एशिया के विश्व दौरे पर थे। इस यात्रा का मकसद था एल्सिनोर में हुई अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन में हिस्सा लेना और अपने संस्थानों के लिए धन जुटाना
2. क्या बात हुई?
बर्लिन में महर्षि कर्वे विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से मिले और शिक्षा के विषय पर विचार-विमर्श किया।
उस समय आइंस्टीन अपनी जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के लिए पूरी दुनिया में मशहूर थे। और कर्वे 1916 में भारत की पहली महिला विश्वविद्यालय SNDT स्थापित कर चुके थे। दोनों का मानना था कि शिक्षा के जरिए ही समाज बदला जा सकता है — एक विज्ञान से, दूसरा महिला शिक्षा से।
3. इस मुलाकात की तस्वीर भी है
महर्षि कर्वे के परिवार के एलबम में “Maharshi Karve with Albert Einstein (Berlin 1929)” नाम से एक फोटो मौजूद है
4. इस यात्रा की एक और खास बात
इसी 1929 के विश्व दौरे में उन्होंने जापान की ‘Women’s University’ भी देखी। पूरी यात्रा का खर्च निकालने के बाद भी उनके पास 15,000 रुपये बचे, जो वो अपने संस्थान के लिए ले आए।
सार: एक वैज्ञानिक जो ब्रह्मांड के रहस्य खोज रहा था, और एक समाज सुधारक जो महिलाओं के जीवन का अंधेरा मिटा रहा था — दोनों की मुलाकात शिक्षा की ताकत पर विश्वास को ही दिखाती है
महर्षि कर्वे का विधवा विवाह — समाज के खिलाफ एक क्रांति
1. पहला विवाह और दुख
- 14 साल की उम्र में बाल विवाह — पत्नी राधाबाई, जो तब 8 साल की थीं
- 1891 में राधाबाई का निधन हो गया। कर्वे 33 साल की उम्र में विधुर हो गए
- 3 बेटे थे: शंकर, दिंकर और भास्कर
2. खुद मिसाल बने — 1893 में विधवा से शादी
राधाबाई के जाने के 2 साल बाद 1893 में महर्षि कर्वे ने गोडूबाई से शादी की। गोडूबाई एक विधवा थीं और उनके पहले पति का देहांत हो चुका था।

उस समय — 130 साल पहले — विधवा विवाह को महापाप माना जाता था। विधवा को सफेद साड़ी, सिर मुंडवाना, समाज से अलग रहना पड़ता था। दोबारा शादी? नामुमकिन।
3. समाज का विरोध झेला
- रिश्तेदारों ने, ब्राह्मण समाज ने बहिष्कार कर दिया
- लोग गाली देते, घर पर पत्थर फेंकते
- नौकरी खतरे में पड़ गई। फर्ग्यूसन कॉलेज में प्रोफेसर थे, वहाँ भी दबाव आया
कर्वे डरे नहीं। बोले: “जो मैं समाज को कहता हूँ, वही पहले खुद करके दिखाऊँगा।”
4. सिर्फ शादी नहीं, आंदोलन चलाया
- 1893: ‘विधवा-विवाहोत्तेजक मंडल’ बनाया — विधवा विवाह को बढ़ावा देने वाली संस्था
- 1896: ‘अनाथ बालिकाश्रम’ खोला — विधवाओं और अनाथ लड़कियों को आश्रय व शिक्षा देने के लिए
- खुद का घर ही आश्रम बना दिया। गोडूबाई ने भी सैकड़ों विधवाओं को पढ़ाया, संभाला
5. नतीजा
उनकी हिम्मत से प्रेरणा लेकर सैकड़ों विधवा विवाह हुए। आज जिसे हम ‘सामान्य’ मानते हैं, उसकी नींव 1893 में कर्वे ने रखी थी।
गोडूबाई का योगदान: वो सिर्फ पत्नी नहीं, कर्वे के मिशन की साथी थीं। ‘पंडिता रमाबाई’ के साथ मिलकर महिला शिक्षा के लिए काम किया। उन्हें भी लोग ‘बाया कर्वे’ कहते थे।
सार: महर्षि कर्वे ने कहा था — “सुधारक पहले खुद सुधरे”। विधवा से शादी करके उन्होंने सिर्फ एक औरत को जीवन नहीं दिया, पूरे समाज की सोच बदल दी
उनके बेटे रघुनाथ कर्वे भी आगे चलकर समाज सुधारक बने — पिता के नक्शे कदम पर।
महर्षि धोंडो केशव कर्वे की समाजसेवा — “एक जीवन, लाखों के लिए
महर्षि कर्वे ने 104 साल के जीवन में जो काम किए, वो आज भी समाजसेवा की मिसाल हैं:
1. महिला शिक्षा — सबसे बड़ा योगदान
- 1896: ‘अनाथ बालिकाश्रम’ — विधवाओं और अनाथ लड़कियों के लिए स्कूल व आश्रम। खुद के घर से शुरू किया
- 1907: ‘हिंगणे स्त्री शिक्षण संस्था’, पुणे
- 1916: भारत की पहली महिला विश्वविद्यालय — SNDT Women’s University की स्थापना। आज लाखों लड़कियाँ यहाँ पढ़ती हैं
- मकसद: “औरत को अपने पैरों पर खड़ा करना” — ताकि वो भीख या दया पर न जिए
2. विधवा उद्धार आंदोलन
- 1893: ‘विधवा-विवाहोत्तेजक मंडल’ बनाया
- खुद 1893 में विधवा गोडूबाई से शादी करके मिसाल कायम की। समाज का बहिष्कार सहा, पर रुके नहीं
- हजारों विधवाओं को पढ़ाया, आत्मनिर्भर बनाया, दोबारा बसाया
3. जाति प्रथा के खिलाफ लड़ाई
- ‘समता संघ’ और ‘जाति निर्मूलन संस्था’ बनाई
- कहते थे: “भगवान ने इंसान बनाए, जाति इंसान ने बनाई”
- दलित-गरीब बच्चों के लिए स्कूल खोले, छात्रवृत्ति दी
4. देवदासी प्रथा का विरोध
देवदासी प्रथा के खिलाफ सम्मेलन बुलाए। लड़कियों को मंदिरों में ‘दान’ करने की कुप्रथा रोकने के लिए कानून की मांग की
5. ग्रामीण शिक्षा का प्रसार
गाँव-गाँव में प्राइमरी स्कूल खुलवाने के लिए संस्थाएं बनाईं। मानते थे कि “असली भारत गाँव में बसता है, और गाँव पढ़ेगा तभी देश बढ़ेगा”
6. 100 साल की उम्र में भी सेवा
1958 में 100 साल के हुए तो भारत सरकार ने भारत रत्न दिया। मंच पर कहा: “ये सम्मान मुझे नहीं, महिला शिक्षा के काम को मिला है”। 104 साल की उम्र तक काम करते रहे।
7. अपने पैसे से नहीं, भीख माँगकर सेवा की
SNDT यूनिवर्सिटी बनाने के लिए देश-विदेश घूमे। 1929 में 71 साल की उम्र में यूरोप-अमेरिका-जापान गए, चंदा इकट्ठा किया। लोग कहते: “बूढ़ा प्रोफेसर भीख माँग रहा है”। वो हँसते: “बेटियों के लिए भीख क्या, जान भी दे दूँ”।
महर्षि कर्वे ने शादी की, नौकरी की, लेकिन जीवन का हर पल समाज को दिया। खासकर उन औरतों को जिनके लिए उस समय समाज के दरवाजे बंद थे।
इसीलिए उन्हें ‘महर्षि’ — महान ऋषि — कहा गया। ऋषि जंगल में तप करते थे, ये कर्वे समाज में तप करते थे
उनकी सीख: “काम इतना छोटा मत करो कि कोई कर सके, और इतना बड़ा मत सोचो कि शुरू ही न कर सको। जो बन पड़े, आज से शुरू करो।
महर्षि कर्वे जैसे महापुरुषों की कहानी सुनना और सुनाना — दोनों ही प्रेरणा देता है।
उन्होंने सिखाया कि एक अकेला इंसान भी अगर ठान ले, तो पूरे समाज की तकदीर बदल सकता है। चल-चलकर स्कूल जाने वाला लड़का, दुनिया की पहली महिला यूनिवर्सिटी बना गया।











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