वह परिवर्तन हम स्वयं हैं जो विश्व में होते हुए देखना चाहते हैं।
अन्धकार का सकारात्मक प्रतिकार निरंतर होते रहना चाहिये। पूरे विश्व में उथल-पुथल हो जाये, या सारा ब्रह्मांड टूट कर बिखर जाये, हमारे ह्रदय में शान्ति बनी रहनी चाहिये। यह तभी संभव है जब हम निरंतर कूटस्थ-चैतन्य यानि ब्राह्मी स्थिति में रहें। परमात्मा की शक्ति — सृष्टि की धारा को बदलने में पूर्णतः सक्षम है। कमी हमीं में है। हम उनका स्मरण नहीं करते, उनके प्रति समर्पित होकर नहीं रहते।
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हमारी कोई आयु नहीं हो सकती। हमारा जन्म ही नहीं हुआ तो आयु कैसे हो सकती है? जन्म तो इस शरीर का हुआ था। हमारा कभी जन्म ही नहीं हुआ।”
“न मे मृत्युशंका न में जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
अपनी आस्था को अडिग रहने दें। ॐ तत् सत्। ॐ शिव। ॐ स्वस्ति॥
कृपा शंकर
२३ जून २०२६
















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