हर मनुष्य की प्रकृति अलग अलग है। अगर आप अपनी प्रकृति के साथ जीवन जी रहे है तो हमेशा सहज रहेंगे।अन्यथा डिप्रेशन तो आना ही आना है _डॉ देवी सहाय पाण्डेय अयोध्या उत्तरप्रदेश

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प्रकृति ही सनातन संस्कृति का मूल धर्म ग्रन्थ है

“अन्ति सन्तं न जह्याति,
अन्ति सन्तं न पश्यति देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यते “

इसी मूल धर्म ग्रन्थ को पढ़ने के आत्म ज्योतिर्मय चक्षु अर्थात ज्योतिष है।

ज्योतिर्वेद के सिद्धांतो के चक्षु से ही प्रतीक भाषा में हम प्रकृति रूपी मूल धर्म ग्रन्थ पढ़ सकते है ।

यही प्रकृति रूपी मूल धर्म ग्रन्थ प्रतीक भाषा में हमे निरंतर ये ज्ञात करा रहा है की गति ही जीवन है। आकाश में ग्रह नक्षत्र गतिशील होने से ही चैतन्य है। धरा भी निरंतर गतिशील होने से वसुन्धरा बनी है। देह में भी जब तक सांसे और धड़कने गतिशील है तभी तक हम जीवित है। रक्त का प्रवाह रुक गया तब भी जीवन संभव कहा ………….?

प्रकृति में पेड़ पौधे इत्यादि भी जब तक आत्मा रूपी बीज से प्रकृति रूपी गर्भ में जुडे रहकर विकसित और वृद्धि को पा रहे तभी तक वो जीवित अर्थात चैतन्य है। अन्यथा गति से रहित अवस्था में पुनः उसका गंतव्य सड़ जाना ही शेष रहेगा।

इसलिए ज्योतिर्वेद में काल पुरूष की कुंडली में प्रथम राशि मेष राशि चर राशि है। जहा से गति का संचार होने से जीवन का आरंभ होता है।

इसी राशि से मंगल की ऊष्मा ऊर्जा बनकर ब्रह्मज्वाला के रूप में हमारे देह में प्रज्वलित होती है। मेडिकल साइंस में हम इसे टेंपरेचर भी कहते है। किंतु ये ऊष्मा या टेंपरेचर जठाराग्नि तक ही सीमित नहीं है। इस अग्नि को वैश्वानर अग्नि कहते है। जिसकी स्तुति से ऋग्वेद का आरंभ होता है। अग्नि शब्द का विशुद्ध वैदिक अर्थ है :-

             "अंग अंग में निहित जीवन्त चेतना" 

ज्योतिर्वेद में मेष राशि चर राशि है जो गति को दर्शाती है अतः वही पहली राशि है । जहा से जीवन गतिशील होने से अस्तित्व में आया ।

लेकिन आधुनिक माता पिता जबरदस्ती अपनी सन्तान के भाग्य विधाता बनने की इच्छा रखते हैं।

एक उदाहरण से इस बात को समझाता हूं।

मान लो एक बच्चा लड़का या लड़की अनुराधा नक्षत्र में उत्पन हुआ। उसके उत्पन होते ही उसकी शनि कि महादशा होगी दो से सात सालों के लिए। मान ले पहले दो साल शनि कि महादशा है, फिर बुध कि महादशा शुरू हो जाएगी सत्रह साल के लिए। अगर बुध अच्छा पड़ा है तो बच्चा बोलने भाषण देने में , एग्जाम में ठीक परफॉर्म करने वाला, अच्छा स्टेज परफॉर्मर होगा अपने जीवन के पहले चौदह पंद्रह साल तक। मां बाप सोचेंगे कि बच्चा बहुत समझदार है। वे बच्चे को डॉक्टर या इंजिनियर बनाने के सपने पाल लेंगे। जबकि अनुराधा नक्षत्र एक अच्छा एक्टर, राजनेता, कॉमेडियन बनने का नक्षत्र है।

अब बच्चे का मत पिता जबरदस्ती उसके बचपन को देख कर उसे जबरदस्ती डॉक्टर या इंजिनियर बनने के लिए उसे फोर्स करना शुरू करेंगे। परन्तु वह तो अच्छा वक्ता है, अच्छा टेक्नोक्रेट नहीं, उसकी स्मृति उस प्रकार की नहीं है। क्योंकि जो अच्छा वक्ता होता है उसकी स्मृति भाग हमेशा कमजोर होता है।

वह फिर कोई भी एग्जाम क्लियर नहीं कर पाएगा और फ्रस्ट्रेटेड हो जाएगा।

जैसे ही बीस या बाईस साल की आयु तक बुध कि महादशा समाप्त होगी वैसे ही सात वर्ष के लिए केतु की महादशा शुरू हो जाएगी। इन सात वर्षो में केतु के प्रभाव से वह बच्चा इनर थॉट प्रोसेस में खो कर अपने अंदर गुम रहना शुरू कर देगा।

अब माता पिता परेशान कि इतना खुशमिजाज बच्चा इतना गुम गुम क्यों रहने लगा है।

जब वह सत्ताइस साल के आयु का होगा तब शुक्र की महादशा बीस वर्षों के लिए शुरू हो जाएगी। यदि उसके माता पिता ने उसे डॉक्टर इंजीनियर बनाने के चक्कर में उसकी प्राकृतिक स्वभाव को बिगाड़ दिया होगा तो फिर नॉर्मल ही लाइफ मिलेगी उसे सभी सुखों के साथ।

लेकिन अगर चौदह से सत्ताइस वर्ष तक उसे अपनी मर्जी से जीने दिया होगा तब शुक्र की महादशा उसे अपनी एक्टिंग, डांसिंग या राजनीति के क्षेत्र में पहचान देगी और तरक्की देगी बीस वर्षों तक।

शुक्र की महादशा के बीस वर्ष पूरे होने के बाद सात वर्ष की सूर्य कि महादशा शुरू होगी।

अगर वह इससे पहले अपने नेचुरल काम कर रहा होगा तब सूर्य अपनी महादशा में उस नाम और प्रसिद्धि देंगे। नहीं तो नॉर्मल लाइफ।

इसीलिए……

माता पिता सिर्फ सुविधाएं दे सकते है, भाग्यविधाता नहीं बन सकते। अगर यह सम्भव होता तो एक राजा की बेटी, एक राजा की बहू, एक राजा की पत्नी माता सीता अपना जीवन वनवास और त्रासदी में नहीं काटती।

ज्यादातर माता पिता बच्चे कि जॉब सिक्योरिटी देख कर उनकी पढ़ाई या कैरियर का चुनाव खुद कर लेते हैं। इसमें अधिकतर असफलता हाथ लगती है।

अगर बच्चे के नेचुरल टेंपरामेंट के आधार पर बच्चा अपने कैरियर का चुनाव करता है तो सफलता जरूर मिलती है और उसका भविष्य सिक्यॉर रहता है। परन्तु सत्रह अठारह साल तक की आयु तक बच्चे भी दोस्तों की देखा देखी करके अपने बारे में फैसले ले लेते हैं।

जबकि उन्हें अपना असली टैलेंट बीस इक्कीस वर्ष की आयु में ही समझ आता है।

हर मनुष्य की प्रकृति अलग अलग है। अगर आप अपनी प्रकृति के साथ जीवन जी रहे है तो हमेशा सहज रहेंगे।

अन्यथा डिप्रेशन तो आना ही आना है।

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