दुर्वासा ऋषि
दुर्वासा ऋषि का परिवार
1. पिता: महर्षि अत्रि – सप्तर्षियों में एक। बहुत बड़े तपस्वी।
2. माता: माता अनसूया – सती-सावित्री के समान पतिव्रता। तीनों देव – ब्रह्मा, विष्णु, महेश – इनके पुत्र रूप में जन्मे।
3. भाई: चंद्रमा, दत्तात्रेय और दुर्वासा – तीनों भाई अनसूया-अत्रि के पुत्र। तीनों देवों के अंश।
4. अवतार: दुर्वासा जी को भगवान शिव का अंशावतार माना जाता है। इसलिए इतने तेजस्वी और तुरंत फल देने वाले।
कहते हैं कि दुर्वासा ऋषि के श्राप से ही राजा नृग छिपकली बने थे। ऋषि की शक्ति पशु-पक्षी सब में रूप बदल सकती है।
ये परिवार श्राप भी दे सकता है, वरदान भी। पर शुद्ध मन वालों को हमेशा आशीर्वाद ही देते हैं।
महर्षि दुर्वासा अमर माने जाते हैं। उनकी कोई साधारण मृत्यु नहीं हुई थी, बल्कि अपने सभी कार्यों और श्रापों को पूरा करने के बाद वे अपनी इच्छानुसार सशरीर ब्रह्मलोक वापस लौट गए थे।
दुर्वासा ऋषि से जुड़ी कुछ प्रमुख कथाएँ इस प्रकार हैं:
लक्ष्मण को श्राप और त्याग: श्रीराम और काल के बीच एक गुप्त वार्ता के समय लक्ष्मण जी को पहरा देना था। महर्षि दुर्वासा ने वहाँ आकर अंदर जाने की जिद की। लक्ष्मण जी ने प्रजा के नाश को टालने के लिए ऋषि को अंदर जाने की सूचना दी।
इस कारण राम-वचन के अनुसार लक्ष्मण जी को अपना शरीर त्यागना पड़ा।
श्रीकृष्ण को श्राप: महाभारत काल में श्रीकृष्ण ने दुर्वासा ऋषि के निर्देशानुसार अपने पैरों पर खीर नहीं लगाई थी। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें श्राप दिया था, जिसके कारण बाद में एक शिकारी के बाण से भगवान श्रीकृष्ण की देह लीला समाप्त हुई।
सशरीर गमन: समस्त लोकों में अपने श्राप और वरदान के उद्देश्यों की पूर्ति के पश्चात, महर्षि दुर्वासा पुनः अपने दिव्य धाम (ब्रह्मलोक या शिवलोक) को लौट गए।












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