ममता बनर्जी //बचपन बेहद गरीबी और संघर्ष में बीता घर में बिजली नहीं थी लालटेन में पढ़ाई करती थीं- एक वक्त का खाना भी मुश्किल से मिलता था। फुटपाथ से मुख्यमंत्री तक का सफर,,

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ममता बनर्जी का बचपन बेहद गरीबी और संघर्ष में बीता

ममता बनर्जी — फुटपाथ से मुख्यमंत्री तक का सफर 1. जन्म और परिवार जन्म5 जनवरी 1955, कोलकाता के *हाज़रा* इलाके में- पिता प्रमिलेश्वर बनर्जी स्वतंत्रता सेनानी थे, पर परिवार बहुत गरीब था- ममता जब *17 साल* की थीं, तभी पिता का निधन हो गया। घर की पूरी जिम्मेदारी कंधों पर आ गई

2. कितनी गरीबी थी?घर में बिजली नहीं थी लालटेन में पढ़ाई करती थीं- एक वक्त का खानाभी मुश्किल से मिलता था। माँ गायत्री देवी लोगों के घर काम करके बच्चों को पालतीं- *चप्पल तक नहीं थी नंगे पांव स्कूल जाती थीं। बारिश में कीचड़ में चलना पड़ता था- कपड़े सिर्फ 2 जोड़ी — एक धोओ, एक पहनो

3. पढ़ाई कैसे की?जोगमाया देवी कॉलेज से BA, फिर *कलकत्ता यूनिवर्सिटी से MA इतिहास- श्री शिक्षायतन कॉलेज से B.Ed, योगेश चंद्र लॉ कॉलेज से LLB- *फीस कहाँ से आई?* ट्यूशन पढ़ाकर, कांग्रेस के दफ्तर में छोटा-मोटा काम करके खुद की फीस भरी- रात-रात भर जागकर पढ़तीं। कहती हैं “गरीबी मेरी सबसे बड़ी टीचर थी”4. राजनीति में एंट्री — संघर्ष यहीं से शुरू

15 साल की उम्र में कांग्रेस जॉइन की। पर्चे बाँटना, दीवार लिखना, नारे लगाना सब किया-

1975 इमरजेंसी में जेल भी गईं। पुलिस की लाठियाँ खाईं- साड़ी-स्लीपर में ही साइकिल/पैदल चलकर प्रचार करतीं। लोग ‘दीदी’ बुलाने लगे

5. गरीबी ने क्या सिखाया?ममता खुद कहती हैं:

मैं AC में नहीं पली। फुटपाथ पर सोई हूँ, भूखे पेट सोई हूँ। इसलिए गरीब का दर्द समझती हूँ। मेरी चप्पल टूटी है, तो दूसरे की टूटी चप्पल देखकर रोना आता है।”

6. आज भी सादगी नहीं छोड़ी

10 डाउनिंग स्ट्रीट जैसी हवेली ठुकराई। आज भी

30 साल पुराने कालीघाट के टाली के घर में रहती हैं-

सफेद सूती साड़ी-हवाई चप्पल यही पहचान। कहती हैं “ये मेरी माँ की दी हुई निशानी है”-

CM रहते हुए भी खुद चाय बनाती हैं, झोला लेकर बाजार जाती हैं

7. गरीबी से निकली योजनाएं

*कन्याश्री*: लड़कियों को पढ़ाई के लिए पैसे — “मैं खुद पढ़ने के लिए तरसी थी”

2. सबुज साथी स्कूल के बच्चों को साइकिल — “मैं नंगे पांव चलती थी”

3. दुआरे सरकार सरकारी सुविधा घर-घर — “गरीब के पास दफ्तर जाने का किराया नहीं होता”

जिस लड़की के पास चप्पल नहीं थी, वो आज बंगाल की 3 बार की मुख्यमंत्री है।

गरीबी ने उन्हें तोड़ा नहीं, फौलाद बना दिया माँ-माटी-मानुष”का नारा भी इसी गरीबी से निकला है।

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