ईश्वर को प्रसन्न करने का एकमात्र मार्ग —
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हमारा हर विचार श्रेष्ठ और पवित्र हो, क्योंकि हमारे विचार ही हमारे कर्म हैं, जिनका फल मिले बिना नहीं रहता। इससे अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है। जैसा हम सोचेंगे, वैसा ही वही कई गुणा बढ़कर हमें मिलेगा। हमारे विचार सदा पवित्र हों। यह बात मैं चुनौती देकर डंके की चोट कह रहा हूँ। यह सृष्टि का अटल नियम और परम सत्य है।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर / १९ जून २०२६
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पुनश्च: एक महात्मा जी और एक वेश्या — दोनों पड़ोसी थे। महात्मा जी दिन-रात उस वेश्या के बारे सोचते थे, और वह वेश्या दिन-रात परमात्मा का चिंतन करती थी। संयोग से दोनों की मृत्यु एक साथ हुई। मरणोपरांत उस वेश्या को स्वर्ग की ओर ले जाया जाने लगा, और महात्मा जी को नर्क की ओर। महात्मा जी ने बहुत विरोध किया और यमदूतों को यहाँ तक कह दिया कि तुम लोग इधर का माल उधर, और उधर का माल इधर कर रहे हो। यमदूतों ने कहा कि हम लोग कोई भूल नहीं करते।
हम लोग कितना भी दान-पुण्य और तप कर लें, लेकिन यदि हमारे विचार सही नहीं है, तो हमारी तपस्या निष्फल है।
ईश्वर को प्रसन्न करने का एकमात्र मार्ग ये है-कृपा शंकर
















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