एक बार परमात्मा की गहनतम अनुभूति हो जाये तब न तो कोई गुरु है और न कोई शिष्य। न कोई भूतकाल है, और न भविष्य_कृपा शंकर

Spread the love


कोई भी आध्यात्मिक साधना हो या कोई भी आस्था — उसके औचित्य का एक ही मापदंड है — “परमात्मा की अनुभूति”। आप किसी भी मार्ग पर चल रहे हों, यदि आपको दिव्य प्रेम, आनंद, और परमात्मा की निरंतर अनुभूति होती है तो वह मार्ग सही है; अन्यथा गलत। हमारा लक्ष्य केवल परमात्मा है।
.
एक बार परमात्मा की गहनतम अनुभूति हो जाये तब न तो कोई गुरु है और न कोई शिष्य। न कोई भूतकाल है, और न भविष्य। उस समय हम कालातीत हैं। अपना सम्पूर्ण विलय परमात्मा में कर दें। जो हमें परमात्मा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे और मार्ग बताए, उस महापुरुष का स्वागत है। लेकिन किसी का भी साथ शाश्वत नहीं है। यहाँ कोई अन्य नहीं है। केवल परमात्मा ही सत्य है, हम उसके साथ एक हैं। अन्य कोई नहीं है, हम भी नहीं। कालातीत परम चेतना को ही कूटस्थ कहते हैं। हम कूटस्थ चैतन्य में रहें।
.
ध्यानस्थ होते ही हमारी चेतना सूक्ष्म जगत में चली जाती है। ध्यान के जिस आसन पर हम बैठते हैं, वह हमारा राजसिंहासन है। ध्यानस्थ होने पर सूक्ष्म जगत के सारे अनंत आकाश, सारे ब्रह्मांड, सारी आकाश-गंगाएँ, सारे चाँद, तारे, नक्षत्र और सारी सृष्टि — हमारे साथ एक हो जाती हैं। जो कुछ भी सृष्ट हुआ है, और जो कुछ भी सृष्ट होना है, वह सम्पूर्ण अस्तित्व हम हैं। हमारे से पृथक कुछ भी नहीं है। परमात्मा के प्रेम और आनंद के रूप में हम व्यक्त होते हैं। समस्त सृष्टि हमारा परिवार, और समस्त ब्रह्मांड हमारा घर है। हम अनंत असीम सर्वत्र हैं। हम और हमारे प्रभु एक हैं। ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *