आखिर क्या है भारतवर्ष का पौराणिक इतिहास…!!!
इतिहास की अनेकों घटनाओं का उल्लेख पुराणों में मिलता है। पुराण वास्तव में इतिहास की ही पुस्तकें हैं, जो पौराणिक काल के इतिहासवृत्त को सुरक्षित रखने के लिए लिखी गयीं। शतायु पुराण के अनुसार धरती के सात द्वीपों का हमें पता चलता है। जिनके नाम जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर थे। इनमें से जम्बूद्वीप सभी के मध्य स्थित है। इस जंबू द्वीप को विद्वानों ने आज के यूरोप और एशिया से मिलकर बना हुआ माना है।
पुराणों की उपरोक्त साक्षी से यह स्पष्ट है कि संपूर्ण भूमंडल के सातों द्वीपों पर आर्यों का ही शासन था और आर्य संपूर्ण भूमंडल के प्रत्येक क्षेत्र से परिचित थे। पुराणों की साक्षी से यह भी सिद्ध है कि पहले संपूर्ण आर्य / हिन्दू जाति जम्बू द्वीप पर शासन करती थी। स्पष्ट है कि यूरोप और एशिया के जितने भर भी देश आज हमें विश्व मानचित्र पर दिखाई देते हैं, वे सबके सब प्राचीन काल के वैदिक धर्मी आर्यों और कालांतर में उनके स्थान पर हिंदू के नाम से पुकारे गये, हमारे पूर्वजों की ही संतानों के देश हैं।
इस जम्बू द्वीप के भी 9 खंड थे, इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भरत, हरि, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। इन 9 खंडों में से भरत नाम के खंड को भरतखंड या भारतवर्ष के नाम से जाना गया। इस भरत खंड का उससे पूर्व का नाम अजनाभ था।
इस भरत खंड के भी नौ खंड थे, इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य, गंधर्व और वारुण तथा यह समुद्र से घिरा हुआ द्वीप उनमें नौवां है। यह भारतवर्ष अफगानिस्तान के हिन्दुकुश पर्वतमाला से अरुणाचल की पर्वत माला और कश्मीर की हिमालय की चोटियों से कन्याकुमारी तक फैला हुआ था। दूसरी ओर यह हिन्दूकुश से अरब सागर तक और अरुणाचल से बर्मा तक फैला था। इसका अर्थ हुआ कि उस समय के भरतखंड के अंतर्गत आज के अफगानिस्तान बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, बर्मा, श्रीलंका, थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया आदि देश आते थे।
इस भरत खंड में कुरु, पांचाल, पुण्ड्र, कलिंग, मगध, दक्षिणात्य, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर, अर्बुदगण, कारूष, मालव, पारियात्र, सौवीर, सन्धव, हूण, शाल्व, कोशल, मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण आदि रहते हैं। इसके पूर्वी भाग में किरात और पश्चिमी भाग में यवन बसे हुए थे।
वायु पुराण के अनुसार त्रेतायुग के हजारों वर्ष पूर्व प्रथम मनु स्वायंभुव मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने इस भारतवर्ष को बसाया था। वायु पुराण के अनुसार महाराज प्रियव्रत को कोई अपना पुत्र नहीं था। ऐसे में उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद ले लिया था, जिनका पुत्र नाभि था। नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम ऋषभ था। इन्ही ऋषभ के पुत्र भरत थे तथा इन्हीं भरत के नाम पर इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा।
प्राचीनकाल में जम्बू द्वीप ही एकमात्र ऐसा द्वीप था, जहां रहने के लिए उचित वातावरण था और उसमें भी भारतवर्ष की जलवायु सबसे उत्तम थी। यहीं विवस्ता नदी के पास स्वायंभुव मनु और उनकी पत्नी शतरूपा निवास करते थे। राजा प्रियव्रत ने अपनी पुत्री के 10 पुत्रों में से 7 को संपूर्ण धरती के 7 महाद्वीपों का राजा बना दिया था और अग्नीन्ध्र को जम्बू द्वीप का राजा बना दिया था। इस प्रकार राजा भरत ने जो क्षेत्र अपने पुत्र सुमति को दिया वह भारतवर्ष कहलाया।
महाभारत के अनुसार भरत का साम्राज्य सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में व्याप्त था। जिसमें वर्तमान भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, तुर्कमेनिस्तान तथा फारस आदि क्षेत्र सम्मिलित थे। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि इन सारे देशों का अतीत भारत का अतीत है। भारत का संपूर्ण इतिहास यदि लिखा जाए तो इन देशों का इतिहास उसमें अपने आप सम्मिलित हो जायेगा।
















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