श्रीराम वो उदार चरित्र हैं जिन्होंने अपने जीवन का एक भी दिन अपने लिये नहीं जिया है कभी ऋषि वशिष्ठ जी के होकर जिये तो कभी महर्षि विश्वामित्र जी के। कभी निषाद राज के होकर जिये तो कभी देवी भीलनी के। कभी गिद्ध राज जटायु के होकर जिये तो कभी कपिराज सुग्रीव के_श्री विजय कुमार शुक्ला राम भूमि

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प्रभु श्री राम की गाथा हमें स्वार्थी नहीं परमार्थी बनाती हैं

राम कथा मानवता का विद्यालय है। अपने लिये जीने की शिक्षा तो हमें किसी भी विद्यालय से प्राप्त हो जायेगी मगर दूसरों के लिये जीवन जीने की प्रेरणा हमें केवल और केवल यह मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की कथा ही सिखाती है।

श्रीराम वो उदार चरित्र हैं जिन्होंने अपने जीवन का एक भी दिन अपने लिये नहीं जिया है। उनका जीवन सदा – सर्वदा परोपकार, परमार्थ एवं लोकहित में ही संलग्न रहा।

कभी ऋषि वशिष्ठ जी के होकर जिये तो कभी महर्षि विश्वामित्र जी के। कभी निषाद राज के होकर जिये तो कभी देवी भीलनी के। कभी गिद्ध राज जटायु के होकर जिये तो कभी कपिराज सुग्रीव के।

प्रभु श्रीराम के जीवन का एक एक दिन मानो किसी दूसरे की प्रसन्नता के लिये ही रहा। पारिवारिक समरसता के भी वो जीवंत उदाहरण हैं। परिवार और समाज की समरसता और प्रसन्नता के लिये जो त्याग प्रभु श्री राम का रहा वह शायद ही किसी और का रहा हो।

राम कथा ही वो कथा है जो हमें त्याग की शिक्षा देती है। इसलिए ये बात कही जाये कि राम कथा परोपकारी, लोकसेवी और परमार्थी बनाने का विद्यालय है तो कोई अतिशयोक्ति भी नहीं होगी।
निचोड़ केवल इतना ही कि प्रभु राम की मंगलमय जीवन गाथा हमें स्वार्थी नहीं परमार्थी बनाती है अथवा यूँ कहें कि पदार्थवादी नहीं परमार्थवादी बनाने की प्रेरणा प्रदान करती है।

बिना श्री राम से प्रेरणा लिये जीवन में देवत्व और शुभत्व नहीं घटता।

  *जय श्री राम*

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