अध्यात्म का वास्तविक उपक्रम स्वयं के होने की प्रकृति की एक गहन खोजबीन है।
संक्षेप में कहा जाए तो यह ऐसा हैं जैसे सूरज अपनी ही रोशनी से सम्मोहित होकर स्वयं को देखें बिना ही उससे निकलतीं किरणों के पीछे भाग रहा है ।
मनुष्य की वासनाएं भी ठीक ठीक अर्थ में ऐसे ही हैँ । मनुष्य की इन्द्रियां ठीक उसके ही भीतर से प्रस्फुटित सुख रुपी किरणों का फैलाव हैँ । जो बाहर से सुख देने और लेने का गहन भ्रम पैदा करती हैँ । लेकिन फिर भी दोष इन्द्रियों का नहीं है। क्योंकि वह मात्र उपकरण हैँ जिन्हें बाहर की ओर उकेरा गया है । नियंता मन है। तो क्या मन दोषी है? नहीं मन का भी कोई दोष नहीं है। क्योंकि वह चेतना का साधन है। और चेतना का पूर्ण रूप से अविद्या के आवरण से चेतन ना होना ही मन की अपनी मनमानी है। इसलिए अध्यात्म का सारा ज़ोर स्वयं के भीतर उस प्रकाश के केंद्र की ख़ोज पर है। जो मन रुपी मैं के अंधेरे को विलीन करने में सहयोगी बनता है ।
अध्यात्म का वास्तविक उपक्रम स्वयं के होने की प्रकृति की एक गहन खोजबीन है।















