मनकी चंचलता मिटानेकी अपेक्षा बुद्धिकी चंचलता मिटाना आवश्यक है

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।।राम जी राम।।

  विचार संजीवनी

  बुद्धिकी चंचलता..

मनकी चंचलता मिटानेकी अपेक्षा बुद्धिकी चंचलता मिटाना आवश्यक है। आजकल मनकी तरफ ध्यान देते हैं, बुद्धिकी तरफ नहीं। बुद्धि मनसे श्रेष्ठ है। भगवान् ने गीतामें मनकी स्थिरताकी अपेक्षा बुद्धिकी स्थिरताको महत्त्व दिया है। बुद्धि ठीक होनेसे मन भी ठीक हो जायगा। बुद्धिमें एक परमात्मप्राप्तिका ही निश्चय हो।

संसार मनुष्यशरीरसे ही आरम्भ हुआ है और मनुष्यशरीरमें ही समाप्त हो सकता है। अभी समाप्तिका मौका है!

‘गंगा गये गंगादास, यमुना गये यमुनादास ‘-
यह बुद्धिकी चंचलता है। परमात्मप्राप्तिका एक निश्चय होना बुद्धिकी स्थिरता है। जबतक भोग और संग्रहकी आसक्ति है, तबतक बुद्धि व्यवसायात्मिका नहीं हो सकती।

राम….राम….राम….राम….राम….राम

परम् श्रद्धेय स्वामी जी श्रीरामसुखदास जी महाराज सागर के मोती (साधन-सुधा-निधि) पृष्ठ सं ५६७