असम के गुवाहाटी में नीलांचल पर्वत पर स्थित कामाख्या मंदिर का इतिहास कई चरणों में जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मूल मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान कामदेव ने विश्वकर्मा जी की मदद से करवाया था। बाद में आक्रांताओं द्वारा इसे नष्ट कर दिया गया।
मंदिर का वर्तमान स्वरूप कोच वंश के राजा नर नारायण द्वारा 1565 ईस्वी में बनवाया गया था। ऐतिहासिक और पुरातात्विक विवरण इस प्रकार हैं:
पौराणिक उत्पत्ति: मान्यता है कि यहाँ माता सती का ‘योनि’ भाग गिरा था, जिससे इस महापीठ की स्थापना हुई।
ऐतिहासिक निर्माण: ऐतिहासिक रूप से मंदिर का निर्माण गुप्त साम्राज्य के दौरान माना जाता है। कालांतर में 15वीं-16वीं शताब्दी में हुसैन शाह के आक्रमण से यह नष्ट हो गया था
वर्तमान जीर्णोद्धार: कोच वंश के संस्थापक राजा विश्व सिंह ने इसके अवशेष खोजे थे। बाद में उनके पुत्र राजा नर नारायण और उनके भाई चिलाराय ने 1565 में वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण पूरा कराया।
वास्तुकला: मंदिर को वास्तुकला की ‘नीलाचल शैली’ में बनाया गया है, जिसमें मधुमक्खी के छत्ते के आकार का गुंबद है।
हर साल जून के महीने में अंबुवाची मेले के दौरान मंदिर के कपाट 3 दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। मान्यता है कि इस दौरान माता रजस्वला होती हैं। इन तीन दिनों तक पास के ब्रह्मपुत्र नदी का पानी भी लाल हो जाता है।
चमत्कारी प्रसाद: चौथे दिन जब मंदिर के कपाट खुलते हैं, तो भक्तों को एक लाल रंग का भीगा कपड़ा ‘अंबुवाची वस्त्र’ के रूप में प्रसाद के तौर पर दिया जाता है, जिसके लाल होने का रहस्य आज भी अनसुलझा है
अघोरियों और तांत्रिकों का केंद्र: इस मंदिर को तंत्र साधना और अघोरियों का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है












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