योगदिवस विशेष // जिन साधकों के साधना की गति तीव्र है, उनकी निर्बीज समाधि शीघ्र सिद्ध होती है_डॉ देवी सहाय पाण्डेय अयोध्या उत्तरप्रदेश

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योगदिवस विशेष

*अभ्यास के लक्षण *

तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यास:।। 13।।

रज-तम वृत्ति शून्य चित्त शान्त बना रहे
तभी योग सिद्ध की ओर चरण बढ़ाता है।
मन जो अशान्त क्लान्त चञ्चल बना रहा तो
कभी योग सिद्धि तक पहुँच न पाता है।
चित्त निज ध्येय पर शान्त बन टिका रहे
योगशास्त्र ‘अभ्यास’ का उपाय सुझाता है।
मन को टिकाने हेतु लगातार बार-बार
होता जो प्रयास है ‘अभ्यास’ कहा जाता है।।

सूत्रार्थ : उन दोनों में से अभ्यास और वैराग्य में से चित्तवृत्तियों के निरोध के लिए जो बार-बार प्रयत्न किया जाता है, उसका नाम अभ्यास है।

*’वशीकार’ संज्ञक अपर वैराग्य के लक्षण *

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्।। 15।।

देखी-सुनी भोग-वस्तुओं के जो अनेक रूप
वही ‘दृष्टानुश्रविक’ भोग कहलाता है।
सहज अरुचि उन सभी भोगों में जगे तो
‘वशीकार’ संज्ञक वैराग्य उर आता है।
भोगों में उपेक्षा बुद्धि आती तो वैराग्य लाती
राग-द्वेष शून्य, चित्त वशी बन जाता है।
लोक-परलोक के सुखों से हो विरक्त चित्त
साधक ‘सम्प्रज्ञात’ योगभूमि श्रेष्ठ पाता है।।

सूत्रार्थ : देखे और सुने हुए जितने भी भोग- विषय हैं, उनमें वैराग्य हो जाना वशीकार संज्ञक वैराग्य है। इसी को अपर वैराग्य भी कहते हैं।

*परवैराग्य के लक्षण *

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्।। 16।।

परिपक्व साधना में परम वैराग्य आता
शुद्ध बुद्ध चित्त गुणातीत बन जाता है।
पहचान जाता तब पुरुष स्वरूप शुद्ध
प्रकृति से टूट जाता कष्टपूर्ण नाता है।
सत्त्व, रज, तम तीनों गुणों से विमुक्त चित्त
‘असम्प्रज्ञात’ नामवाली समाधि को पाता है।
यही ‘परवैराग्य’ ही आत्मकाम है बनाता
कैवल्य की दिव्य भूमि यही दिखलाता है।।

सूत्रार्थ : प्रकृति-पुरुष सम्बन्धी यथार्थ ज्ञान के हो जाने पर अर्थात् आत्मज्ञान हो जाने पर प्रकृति के गुणों में तृष्णा का सर्वथा अभाव हो जाना’ परवैराग्य’ है।

*सम्प्रज्ञातयोग के अवान्तर भेदों का कथन *

वितर्कविचारानन्दाऽस्मितानुगमात्सम्प्रज्ञात:।। 17।।

वितर्क, विचार, आनन्द, अस्मिता प्रसार युक्त
सम्प्रज्ञात समाधि योगी साधक लगाते हैं।
धीर-धीरे ध्यान में पयान करते हैं आगे
स्थूल छोड़ सूक्ष्म की ओर बढ़ जाते हैं।
योग-यात्रा में यहाँ है सूक्ष्मता की ओर जाना
धीर-धीरे योगी निज चरण बढ़ाते हैं।
गुणातीत होकर कैवल्यरूप पाते योगी
जन्म औ मरण चक्र से वे मुक्ति पाते हैं।।

सूत्रार्थ : वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता नामक स्वरूपों के सम्बन्ध से जो चित्तवृत्तियों का निरोध होता है, वह सम्प्रज्ञात समाधि कहलाता है अर्थात् वितर्क के सम्बन्ध से जो समाधि होती है, उसका नाम ‘वितर्कानुगत’, विचार के सम्बन्ध से ‘विचारानुगत’, आनन्द के सम्बन्ध से ‘आनन्दानुगत’ और अस्मिता के सम्बन्ध से होने वाली समाधि का नाम ‘अस्मितानुगत’ सम्प्रज्ञात समाधि है।

*भवप्रत्यय का कथन *

भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ।। 19।।

दग्ध संस्कार बीज हुए नहीं, छूटा देह
इससे पुनर्जन्म योगी फिर पाता है।
ऐसे जन्म वाला कहा जाता है विदेह योगी
बिना ही उपाय उसे मोक्ष मिल जाता है।
पूर्वजन्मकृत सभी साधना से युक्त वह
पूर्व साधना उपाय नहीं अपनाता है।
जगत् में जन्ममात्र कैवल्य का कारण है
इसीलिए यह ‘भवप्रत्यय’ कहाता है।।

सूत्रार्थ : जो साधक सम्प्रज्ञात समाधि की स्थिति को पार करके असम्प्रज्ञात समाधि के क्षेत्र में प्रवेश के निकट पहुँच गए और शरीर छूट गया, इस स्थिति में पुनर्जन्म प्राप्त साधक की योगसिद्धि की जो सहज क्षमता है, वह ‘भवप्रत्यय’ कही जाती है और यह क्षमता या स्थिति विदेहों और प्रकृतिलयों की होती है।

योग के शीघ्र सिद्ध होने का कारण-कथन

तीव्रसंवेगानामासन्न:।।21।।

साधना में जितनी तत्परता जो साधक लायेगा।
उतनी ही शीघ्रतापूर्वक सिद्धि-लाभ पायेगा।।

सूत्रार्थ : जिन साधकों के साधना की गति तीव्र है, उनकी निर्बीज समाधि शीघ्र सिद्ध होती है।

*साधना में तीव्रता और सिद्धि *

मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेष:।। 22।।

विवेक-वैराग्य औ अभ्यास का महत्व अति
सिद्धि-प्राप्ति में ये काल-भेद बना आता है।
‘तीव्रसंवेग’ भी ‘मृदु’ ‘मध्य’ ‘अधिमात्र’ रूप
तीन भेदों वाला सुधियों में गिना जाता है।
‘मृदु’ अति देर, ‘मध्य’ कुछ कम देर, वेग
‘अधिमात्र’ वाला शीघ्र सिद्धियों को लाता है।
संवेग का ध्यान रक्खें योगिजन साधना में
‘संवेग’ ‘उपाय’ साधना में बलदाता है।।

सूत्रार्थ : तीव्र संवेग वालों की अभ्यास मात्रा और तत्परता में भी तीन भेद हैं। कुछ मृदुतीव्रसंवेग, कुछ मध्यतीव्रसंवेग और कुछ अधिमात्रतीव्रसंवेग वाले होते हैं। संवेग की मात्रा में तीव्रता की मात्रा सिद्धि-काल में अन्तर बनकर आती है।

*साधना में ईश्वर तत्व का महत्व *

ईश्वरप्रणिधानाद्वा।। 23।।

ईश्वर भी योग के प्रयोग में सहायक है
साधना में वह पतवार बन जाता है।
छल छोड़ नाता जोड़ शरण में जाता जो है
शरण में आये को सुशीघ्र अपनाता है।
सर्व शक्तिमान वह ईश्वर महान, इच्छा-
मात्र से ही सिद्धि देता, विघ्न को मिटाता है।
निर्बीज समाधि औ समाधिजन्य मुक्ति-फल
सच्चा ईश-भक्त अनायास शीघ्र पाता है।।

सूत्रार्थ : पूर्वोक्त अधिमात्र उपाय एवं अधिमात्र तीव्रसंवेग के अतिरिक्त ईश्वर-प्रणिधान से सभी शीघ्रतम समाधि का लाभ होता है।

- डॉ देवीसहाय पाण्डेय 'दीप'

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