मुगल बादशाह हुमायूं
भारतीय इतिहास में सबसे प्रसिद्ध उदाहरण हुमायूं का है। सन 1540 में चौसा और कन्नौज के युद्ध में अफगान शासक शेरशाह सूरी से बुरी तरह हारने के बाद हुमायूं को अपनी जान बचाकर भारत से भागना पड़ा था। वह लगभग 15 वर्षों तक दर-दर भटकता रहा और फारस (ईरान) में शरण ली, जिसके बाद 1555 में उसने दोबारा दिल्ली पर अधिकार किया
शेरशाह सूरी से युद्ध हारने के बाद मुगल बादशाह हुमायूँ को भारत छोड़कर भागना पड़ा था।
मुख्य कारण और घटनाएं
चौसा का युद्ध (1539)
बिहार के चौसा (बक्सर के पास) में गंगा और कर्मनाशा नदी के पास शेर खान (शेरशाह सूरी) की सेना ने हुमायूँ पर अचानक रात में हमला किया। अपनी जान बचाने के लिए हुमायूँ घोड़े समेत गंगा नदी में कूद गया था, जहाँ एक भिश्ती (निजाम) ने उसकी जान बचाई।
कन्नौज / बिलग्राम का युद्ध (1540)
17 मई 1540 को कन्नौज (बिलग्राम) के युद्ध में शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को बुरी तरह परास्त किया। इस हार के बाद हुमायूँ की सत्ता पूरी तरह छिन गई।
निर्वासित जीवन
भारत छोड़ने के बाद हुमायूँ पहले सिंध और राजस्थान की तरफ भटका, अपने भाइयों से निराशा मिलने के बाद वह मदद के लिए ईरान (फारस) के शाह तहमास्प के पास चला गया।
पुनर्वापसी (1555)
लगभग 15 वर्ष बाद ईरान के शाह की सैन्य मदद से और अपने वफादार सेनापति बैरम खान के साथ हुमायूँ ने काबुल-पंजाब होते हुए सरहिंद और मच्छीवाड़ा का युद्ध जीता और 1555 में दिल्ली की गद्दी पर दोबारा अधिकार किया।











