।।राम जी राम।।
विचार संजीवनी
प्रेम के बिना ज्ञान कुछ नहीं
भगवान् ज्ञानीको मुक्त करके उऋण हो जाते हैं, पर भक्तके सदा ऋणी रहते हैं। ज्ञानी भगवान्को कुछ दे नहीं सकता। पर भक्त भगवान्को प्रेम देता है। भगवान् प्रेमके भूखे हैं, ज्ञानके नहीं। प्रेम ऐसी चीज है, जिससे कभी तृप्ति नहीं होती।
प्रेमके बिना ज्ञान कुछ नहीं है। ज्ञान बहुत बड़ी पूँजी है, पर प्रेम (आकर्षण)-के बिना वह पूँजी किस कामकी ? कंकड़-पत्थर है ! रुपयोंके आकर्षण (लोभ) -में जो रस है, वह रुपयोंके ज्ञानमें नहीं है।
जो सबके प्रेमी होते हैं, वही भगवान्के प्रेमी होते हैं। भक्त सबसे प्रेम करता है- ‘मंद करत जो करइ भलाई’ (मानस, सुन्दर० ४१।४)। भक्त सबको भगवत्स्वरूप समझते हैं। प्रेमी भक्त किसीको बुरा नहीं मानता, किसीका बुरा नहीं चाहता और किसीका बुरा नहीं करता। अतः हम भी किसीको बुरा न मानें, बुरा न चाहें और बुरा न करें तो हम प्रेमी हो जायँगे।
परम् श्रद्धेय स्वामी जी श्रीरामसुखदास जी महाराज साधन-सुधा-निधि पृष्ठ ५८६ (द्वितीय संस्करण)















