जिस मौन में ‘मैं’ भी शांत हो जाए,
वहीं आत्मा का बोध होता है।
केवल बोलना बंद कर देना मौन नहीं है।
बाहर शांति हो सकती है,
लेकिन भीतर विचारों, इच्छाओं
और अहंकार का शोर चलता रह सकता है।
सच्चा मौन तब है
जब भीतर का ‘मैं’ भी शांत होने लगे।
“मैं ही कर्ता हूँ”,
“मैं ही सही हूँ”,
“सब मेरे अनुसार होना चाहिए”
जब इन भावों की पकड़ ढीली पड़ती है,
तब भीतर एक अलग ही शांति प्रकट होती है।
ब्रह्मज्ञान कहता है,
आत्मा को कहीं से प्राप्त नहीं करना है।
वह तो पहले से उपस्थित है।
मन और अहंकार का शोर
केवल उसकी पहचान को ढक देता है।
जब विचार शांत होते हैं
और ‘मैं’ की पकड़ भी ढीली पड़ती है,
तब जो शेष रहता है
वही शुद्ध चेतना है।
उस मौन में कुछ नया मिलता नहीं,
जो सदा से था वही स्पष्ट होने लगता है।
शिवोहम ।















