निर्बल और असहाय लोगों की सहायता करना ईश्वर की सच्ची भक्ति है। जब मनुष्य अपनी पूरी ताकत से प्रयास करता है और हार मानने लगता है, तब ईश्वर उसे सहारा देते हैं

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निर्बल और असहाय लोगों की सहायता करना ईश्वर की सच्ची भक्ति है। जब मनुष्य अपनी पूरी ताकत से प्रयास करता है और हार मानने लगता है, तब ईश्वर उसे सहारा देते हैं। सच्चा आध्यात्मिक लाभ निश्छल मन और परमेश्वर पर पूर्ण विश्वास रखने से मिलता है, जो कमजोरों को दिव्य शक्ति और साहस प्रदान करते हैं।


आसंभव परिस्थितियों में भी ईश्वर अपनी शक्ति से सहायता करते हैं, इसलिए धैर्य रखें।
प्रार्थना ऐसे करो जैसे सब कुछ ईश्वर पर निर्भर हो, और प्रयास ऐसे करो जैसे सब कुछ आप पर निर्भर हो” – यह एक प्रचलित कहावत है, जो बताती है कि कोशिश करने वालों की मदद ऊपरवाला करता है
कमजोरों के प्रति करुणा और दया भाव रखना ही ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का मार्ग है।
स्वयं की सहायता: यह विश्वास कि “ईश्वर उनकी मदद करते हैं जो अपनी मदद आप करते हैं,” सही है।
विश्वास: जो निर्बल हैं, उन्हें निराश न होकर, ईश्वर के वादों और सर्वशक्तिमान सामर्थ्य पर भरोसा रखना चाहिए।


निर्बल को ईश्वर की सहायता का भाव यह है कि आप अपनी कमजोरी को ही ईश्वर के सामने समर्पण का कारण बना लें।
हमारे परम पिता , ज्ञान के सागर , शक्ति दाता और संसार के रूपांतरणकर्ता हैं। वे हमें शक्ति और मार्गदर्शन प्रदान करते हुए कर्म के नियम का सम्मान करते हैं। ईश्वर को समझने और उनसे जुड़ने से हम आध्यात्मिक सशक्तिकरण और रूपांतरण की यात्रा पर अग्रसर होते हैं, जो हमें शांति, प्रेम और आनंद से भरे जीवन की ओर ले जाती है

भगवद् गीता के अनुसार,

ईश्वर (परमेश्वर) ब्रह्मांड के निर्माता, पालक और संहारकर्ता हैं, जो सर्वव्यापी हैं और सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं, जो अनादि, अपरिवर्तनीय और सगुण (साकार) व निर्गुण (निराकार) दोनों रूपों में प्रकट होते हैं, जो धर्म की स्थापना और प्राणियों के कल्याण के लिए अवतार लेते हैं और प्रेम, ज्ञान और आनंद का शाश्वत स्वरूप हैं, जिसे मनुष्य अपने कर्तव्य (धर्म) के पालन और भक्ति के माध्यम से अनुभव कर सकता है। 

सर्वोच्च सत्ता: ईश्वर ही एकमात्र परम सत्य हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के स्रोत, आधार और अंत हैं। 
सर्वव्यापी और अंतर्यामी: वे हर जगह मौजूद हैं और हर प्राणी के हृदय में वास करते हैं (ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति)। 
सृष्टिकर्ता, पालक और संहारकर्ता: वे ही संसार को बनाते, चलाते और नष्ट करते हैं (उत्पत्तिकर्ता, पालनकर्ता, संघारकर्ता)। 
धर्म और नैतिकता के स्रोत: वे नैतिक व्यवस्था के परम स्रोत हैं और धर्म के अनुसार जीवन जीने के लिए प्रेरित करते हैं। 
अवतार और लीला: जब-जब धर्म की हानि होती है, वे अपनी योगमाया से प्रकट होकर पृथ्वी पर आते हैं (अवतार लेते हैं)। 
सगुण और निर्गुण स्वरूप: वे निर्गुण (निराकार) ब्रह्म भी हैं और सगुण (साकार, जैसे कृष्ण) रूप में भी प्रकट होते हैं। 
प्रेम, ज्ञान और आनंद: उनका स्वरूप शाश्वत आनंद, प्रेम और ज्ञान है। 
काल (समय) से परे: वे समय (काल) से भी परे हैं, जो सभी का भक्षक है, लेकिन स्वयं उससे प्रभावित नहीं होते। 
गीता में ईश्वर एक अमूर्त सिद्धांत नहीं, बल्कि एक सक्रिय, व्यक्तिगत और सर्वशक्तिमान सत्ता है जो सृष्टि और धर्म के साथ निरंतर जुड़ी हुई है।

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