भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह एक प्रमुख प्रेम विवाह माना जाता है, जो तपस्या, समर्पण और अटूट प्रेम का प्रतीक है। माता पार्वती ने शिवजी को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की, जिससे वे प्रसन्न हुए और वैराग्य छोड़कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया।
शिव-पार्वती विवाह की मुख्य बातें:
प्रेम की जीत: शुरू में उदासीन होने के बावजूद, शिव जी पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर विवाह के लिए सहमत हुए।
अर्धनारीश्वर रूप: यह विवाह शिव (चेतना) और शक्ति (ऊर्जा) के मिलन का प्रतीक है।
स्थान: यह पौराणिक प्रेम विवाह उत्तराखंड के त्रियुगीनारायण मंदिर में संपन्न हुआ था।
प्रतीक: यह विवाह दर्शाता है कि सच्चा प्रेम और दृढ़ संकल्प किसी भी चुनौती को पार कर सकता है।
यह विवाह न केवल प्रेम का, बल्कि दो विपरीत स्वभावों (तपस्वी शिव और राजकुमारी पार्वती) के मिलन का भी एक अनूठा उदाहरण है।

भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (महाशिवरात्रि) को पार्वती जी की कठोर तपस्या और प्रेम से प्रसन्न होकर हुआ। अनोखी बारात के साथ शिवजी हिमाचल के घर पहुँचे और त्रियुगीनारायण मंदिर में भव्य तरीके से रस्म पूरी हुई, जिसे भगवान विष्णु ने बहन की भूमिका निभाकर संपन्न कराया।
विवाह की मुख्य बातें:

तपस्या और प्रणय: माता पार्वती ने शिवजी को पति के रूप में पाने के लिए वर्षों कठोर तपस्या की थी।
अनोखी बारात: शिवजी की बारात में देवता, गंधर्व, यक्ष के साथ ही भूत-प्रेत, पिशाच और विभिन्न भयानक जीव शामिल थे।
पार्वती जी का अनुरोध: बारात के भयानक रूप को देखकर माता पार्वती की माता मैनावती भयभीत हो गई थीं, तब पार्वती जी ने शिवजी से सुंदर दिव्य रूप धारण करने का अनुरोध किया।

ससुराल में श्रृंगार: पार्वती जी के आग्रह पर शिवजी ने श्रृंगार किया और एक सुंदर रूप में विवाह मंडप में आए।
विवाह स्थल: उत्तराखंड के त्रियुगीनारायण मंदिर में शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ, जहाँ अग्निकुंड के फेरे लिए गए थे।
यह विवाह महाशक्ति (पार्वती) और शिव के मिलन का प्रतीक है, जो ब्रह्मांडीय संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
















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