सच्चा धन “दौलत” नहीं, कुछ और है
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“तृष्णा” का कहीं अंत नहीं, हविस छाया के समान है, जिसे आज तक कोई भी पकड़ नहीं सका है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य केवल पैसा पैदा करना ही नहीं वरन् इससे भी कुछ बढ़कर है। “तृष्णा” के सताए हुए “कंजूस” मनुष्य, भिखमंगों से जरा भी कम नहीं हैं, भले ही उनकी तिजोरियां सोने से भरी हुई हों ।
“सच्ची दौलत” का मार्ग “आत्मा” को “दिव्य गुणों” से सम्पन्न करना है। सच समझिए हृदय की सदृवृत्तियों को छोड़कर बाहर कहीं भी सुख-शान्ति नहीं है । भ्रमवश भले ही हम बाह्य परिस्थितियों में सुख ढूँढ़ते फिरें। यह ठीक है कि कुछ कमीने और निकम्मे आदमी भी अनायाास “धनवान” हो जाते हैं, पर असल में वे “धनपति” नहीं हैं। यथार्थ में तो “दरिद्रों” से अधिक “दरिद्रता” भोग रहे हैं, उनका धन बेकार है, अस्थिर है और बहुत अर्थों में तो वह उनके लिए दुःखदायी भी है।दुर्गुणी धनवान कुछ नहीं, केवल एक भिक्षुक है। मरते समय तक जो धनी बना रहे कहते हैं कि वह बड़ा भाग्यवान था, लेकिन हमारा मत है कि वह “अभागा” है, क्योंकि अगले जन्म में अपने पापों का फल तो वह स्वयं भोगेगा, किन्तु “धन” को न तो भोग सका और न साथ ले जा सका।
जिसके हृदय में “सत्प्रवृत्तियों” का निवास है, वही सबसे बड़ा “धनवान” है, चाहे बाहर से वह गरीबी का जीवन ही क्यों न व्यतीत करता हो ।”सद्गुणी” का सुखी होना निश्चित है। समृद्धि उसके स्वागत के लिऐ दरवाजा खोले खड़ी हुई है। यदि आप स्थाई रहने वाली सम्पदा चाहते हैं तो “धर्मात्मा” बनिए । लालच में आकर अधिक पैसे जोड़ने के लिए दुष्कर्म करना यह तो कंगाली का मार्ग है। खबरदार रहो, कि कहीं लालच के वशीभूत होकर सोना कमाने तो चलो, पर बदले में मिट्टी ही हाथ लगकर न रह जाये ।
















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