ऋषि कन्याओं का पहनावा पारंपरिक रूप से साधारण होता था, उनका पहनावा सादगी और प्राकृतिक जीवन का प्रतीक था।

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ऋषि कन्याओं (आश्रम में रहने वाली कन्याएं) का पहनावा पारंपरिक रूप से साधारण होता था, जो वल्कल (पेड़ की छाल) या साधारण सूती वस्त्रों से बना होता था। यह आधुनिक सिलाई वाले वस्त्र (जैसे सीना या सिला हुआ ब्लाउज) नहीं पहनते थे। उनका पहनावा सादगी और प्राकृतिक जीवन का प्रतीक था।
प्राचीन वेशभूषा: ऋषियों के आश्रम में रहने वाली कन्याएं या तपस्विनी, जैसे कि शकुंतला, आम तौर पर अनसले कपड़े या साधारण वस्त्र धारण करती थीं।
वल्कल (Tree Bark): वे अक्सर ‘वल्कल’ वस्त्र धारण करती थीं, जो वृक्षों की छाल से बनता था।
जीवनशैली: आश्रम में विलासिता का अभाव था, इसलिए पहनावा भी सहज और सुलभ सामग्रियों से निर्मित होता था, न कि आधुनिक सीले हुए परिधान
ऋषि-मुनियों या पारंपरिक सनातनी शादियों में सोने (Gold) का उपयोग वर्जित नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और औषधीय दृष्टि से शुभ माना जाता है। सोने को शुद्धता और लक्ष्मी का प्रतीक मानकर मंगल कार्यों में धारण किया जाता है। हालाँकि, अत्यधिक क्रोधी या पेट की समस्याओं वाले व्यक्तियों को सोना पहनने से बचने की सलाह दी जाती है। 
भारतीय संस्कृति में सोने के उपयोग से जुड़े कुछ मुख्य पहलू:
आध्यात्मिक और शुभ: सोने को ‘सुवर्ण’ (पवित्र धातु) कहा जाता है। हिंदू शादियों में उपहार स्वरूप सोना देना सौभाग्य, समृद्धि और सकारात्मकता का प्रतीक है।
वैज्ञानिक और औषधीय मान्यता: मान्यता है कि यह शरीर से नकारात्मकता दूर करता है।
सावधानी: आयुर्वेदिक दृष्टि से, अत्यधिक क्रोधी, वाचाल या व्यग्र (अधैर्य) लोगों को सोना धारण नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह शरीर की ऊर्जा को बढ़ा सकता है।

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