विदुर का जन्म ऋषि व्यास और रानी अंबिका की दासी (परिश्रमी/सुभद्रा) के गर्भ से नियोग विधि द्वारा हुआ था। वे यमराज के अवतार माने जाते हैं, जिन्हें माण्डव्य ऋषि ने दासी पुत्र के रूप में जन्म लेने का श्राप दिया था। अपनी बुद्धिमत्ता और धर्मपरायणता के कारण वे धृतराष्ट्र और पाण्डु के भाई होने के बावजूद हस्तिनापुर के महामंत्री बने।
विदुर के जन्म से जुड़े प्रमुख विवरण:
मूल: रानियों के डर से (व्यास जी के रूप को देखकर) न आने पर, दासी ने नियोग में भाग लिया, जिसके कारण एक स्वस्थ और परम ज्ञानी विदुर का जन्म हुआ।
अवतार: उन्हें धर्मराज (यमराज) का अवतार माना जाता है, जिन्हें एक ऋषि को गलत सजा देने के कारण यह श्राप मिला था।
परिचय: वे धृतराष्ट्र और पाण्डु के सौतेले भाई थे।
विदुर नीति: विदुर अपनी दूरदर्शिता, न्यायप्रियता और नीति के लिए प्रसिद्ध हैं।
विदुर महाभारत के एक प्रमुख पात्र, हस्तिनापुर के प्रधानमंत्री, और कौरव-पांडवों के बुद्धिमान चाचा थे, जिन्हें धर्मराज (यमराज) का अवतार माना जाता है। वे वेदव्यास और एक दासी के पुत्र थे। अपनी बुद्धिमत्ता, कूटनीति, और निष्पक्ष सत्य बोलने के लिए प्रसिद्ध, उन्होंने धृतराष्ट्र को हमेशा धर्म के मार्ग पर चलने की सलाह दी, जिसे विदुर नीति कहा जाता है। “महत्वपूर्ण चरित्र महात्मा विदुर जी एवं उनकी धर्मपत्नी पर प्रभु श्री कृष्ण की कृपा के अत्यंत ही रोचक प्रसंग से अवगत होंगे, जिसमें प्रभु श्री कृष्ण बगैर आमंत्रण के महात्मा विदुर जी के घर जाकर उनके यहाँ भोजन करने की इच्छा व्यक्त करते हैं। इस संबंध में आज भी कहा जाता है कि दुर्योधन के मेवा त्यागे साग विदुर घर खाई। भगवान श्री वेद व्यास जी के पुत्र होने के कारण महात्मा विदुर जी महाराज धृतराष्ट्र एवं महाराज पांडू के सहोदर थे, किंतु उनकी माता के एक दासी होने के कारण धर्मात्मा एवं विद्वान विदुर जी को परिवार में वह सम्मान प्राप्त नहीं होता था जिसके कि वे अधिकारी थे। आदर्श भगवतभक्त, उच्च कोटि के साधु एवं स्पष्टवादी महात्मा विदुर जी हस्तिनापुर के प्रधानमंत्री एवं महाराज धृतराष्ट्र के प्रमुख सलाहकार थे।
महाराज धृतराष्ट्र के पुत्रमोह और दुर्योधन के व्यवहार पर महात्मा विदुर जी का सदैव ही विरोध रहा होकर उन्होंने महाराज धृतराष्ट्र को समझाने के भी काफी प्रयास किये किंतु दोनों पिता पुत्र के व्यवहार में किसी प्रकार कोई परिवर्तन नहीं आता बल्कि दुर्योधन अपशब्द कहकर महात्मा विदुर जी का तिरस्कार कर अपमान करता था। द्यूत क्रीडा के बाद पांड़वों के वनवास और अज्ञातवास के लिए जाने के पश्चात महात्मा विदुर जी भी हस्तिनापुर छोड़ कर अपनी पत्नी के साथ वन को चले गए और वहीं नदी किनारे अपनी कुटिया बनाकर रहने लगे और प्रभु भक्ति में लीन हो गये। महात्मा विदुर जी की पत्नी भी उन्हीं के समान परम साध्वी, त्यागमूर्ति भक्ता थी और प्रभु श्री कृष्ण में उनकी अनुपम प्रीति थी, श्री कृष्ण की इन परम भक्ता का नाम पारसंवी था किंतु कहीं कहीं इनका नाम सुलभा भी बताया गया है।
दासी पारसंवी // ऋषि व्यास और रानी अंबिका की दासी (परिश्रमी/सुभद्रा) पारसंवी जो बिंदुर जैसे दूरदर्शिता, न्यायप्रियता जैसे प्रसिद्ध व्यक्ती को जन्म दिया था
















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