पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः। पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवताः॥
इस का अर्थ है कि पिता ही धर्म हैं, पिता ही स्वर्ग हैं और पिता ही सबसे बड़ा तप (तपस्या) हैं। पिता के प्रसन्न होने पर सभी देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं; यह श्लोक पितृ-भक्ति और माता-पिता के सम्मान के महत्व को दर्शाता है, क्योंकि उनकी प्रसन्नता में ही ईश्वर की प्रसन्नता निहित है।
पिता धर्मः
पिता ही धर्म का पालन करने वाले, धर्म के मार्गदर्शक और स्वयं धर्म स्वरूप होते हैं, जो बच्चों को सही राह दिखाते हैं।
पिता स्वर्गः
पिता ही स्वर्ग के समान सुख और आश्रय प्रदान करते हैं; वे बच्चों के लिए दुनिया की सभी कठिनाइयों से बचाने वाले वृक्ष की छाया के समान हैं।
पिता हि परमं तपः
पिता की सेवा करना और उनकी प्रसन्नता प्राप्त करना ही सबसे बड़ी तपस्या है, जो सभी सांसारिक सुखों से बढ़कर है।
पितरि प्रीतिमापन्ने
जब पिता पुत्र/पुत्री से प्रेम और प्रसन्न होते हैं, या जब पुत्र/पुत्री पिता को प्रसन्न करते हैं।
प्रीयन्ते सर्वदेवताः
तब सभी देवता, अर्थात सभी शक्तियाँ और ईश्वरीय कृपा, प्रसन्न हो जाती हैं।
यह पद्मपुराण से लिया गया है और माता-पिता के प्रति बच्चों के कर्तव्य और उनके महत्व को उजागर करता है, जिसमें उनकी सेवा और सम्मान को ही परम धर्म और तपस्या माना गया है।
















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