आज जब मैं अपने लगाए बगीचे को सींचते हुए माँ सरस्वती का स्मरण करता है, तब यह केवल एक व्यक्तिगत अनुभूति नहीं रहती, बल्कि वह पूरे समाज के बदलते चरित्र का आईना बन जाती है। प्रकृति, परिश्रम और अध्यात्म—ये तीनों सदियों से भारतीय ग्राम्य जीवन की आत्मा रहे हैं। किंतु आधुनिकता की आँधी में यह आत्मा धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही है।
एक समय था जब गाँवों में पक्के मकान गिने-चुने होते थे। वही सम्पन्न और बलशाली परिवार पूरे गाँव के आर्थिक और सामाजिक संतुलन का आधार होते थे। खेती केवल आजीविका नहीं, बल्कि एक सामूहिक साधना थी। खलिहान में महीनों चलने वाली मड़ाई, बैलों के घिसते खुर, पुर, मोट और रहट से होती सिंचाई—ये सभी दृश्य श्रम की गरिमा के प्रतीक थे। ज्वार, बाजरा, चना जैसे मोटे अनाज केवल शरीर को नहीं, बल्कि जीवन को भी बल देते थे।
महिलाएँ घर पर जान्त-चकरी चलाकर आटा-दाल पीसती थीं। यह श्रम केवल घरेलू कार्य नहीं था, बल्कि स्वास्थ्य और स्वावलंबन का माध्यम था।
आयुर्वेद भी स्पष्ट कहता है—“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की साधना का पहला साधन स्वस्थ शरीर ही है।
आज स्थिति बिल्कुल उलट है। आधुनिकता के नाम पर सुविधा तो बढ़ी, पर श्रम घट गया। मशीनी युग ने खेतों से बैलों को और खलिहानों से परिश्रम को बाहर कर दिया। अब तीन दिन में खलिहान साफ हो जाता है, पर शरीर में जमी आलस्य की परतें वर्षों में भी नहीं उतरतीं। समय की बचत हुई, किंतु उस समय का सदुपयोग नहीं हुआ। परिणामस्वरूप अकर्मण्यता को बढ़ावा मिला।
सनातन धर्म में कर्म को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—“न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्” अर्थात कोई भी मनुष्य एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। परंतु आज का मनुष्य कर्म से बचने के नए-नए साधन खोज रहा है।
शारीरिक श्रम से दूरी का सीधा परिणाम स्वास्थ्य पर पड़ा है। जहाँ पहले लोग मेहनत से थकते थे, आज वे बीमारियों से थकने लगे हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा—ये आधुनिक रोग नहीं, बल्कि आधुनिक आलस्य के परिणाम हैं।
विडंबना यह है कि पसीना बहाने के लिए अब लोग सुबह-शाम सड़क पर टहलने निकलते हैं, जबकि पहले वही पसीना खेतों, खलिहानों और चक्कियों में स्वतः बहता था।
बजट बिगड़ने की चिंता भी इसी व्यवस्था की देन है। जब जीवन प्रकृति के अनुकूल था, आवश्यकताएँ सीमित थीं।
ईशावास्योपनिषद का सूत्र— “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा” अर्थात त्याग के साथ उपभोग करो—आज भी उतना ही प्रासंगिक है। किंतु उपभोग की अंधी दौड़ ने मनुष्य को प्रकृति और स्वयं से दूर कर दिया है।
भारतीय संस्कृति ने कभी श्रम को हीन नहीं माना। राम वनवास में लकड़ी काटते हैं, सीता जल भरती हैं, स्वयं भगवान कृष्ण गोवर्धन उठाते हैं और अर्जुन को युद्धभूमि में कर्म का उपदेश देते हैं। श्रम यहाँ तपस्या है, योग है।
आज आवश्यकता है कि हम समय रहते इस बदलाव को पहचानें। मशीनें साधन बनें, स्वामी नहीं। शारीरिक मेहनत को फिर से जीवन का हिस्सा बनाया जाए—चाहे वह खेती हो, बागवानी, सफाई या साधारण दैनिक कार्य। केवल जिम में पसीना बहाना समाधान नहीं, बल्कि जीवनशैली में श्रम का समावेश ही स्थायी उत्तर है।
यदि हमने परिश्रम, प्रकृति और सनातन जीवन-मूल्यों से नाता पूरी तरह तोड़ लिया, तो आधुनिकता हमें सुविधा तो देगी, पर स्वास्थ्य, संतोष और संस्कार छीन लेगी। इसलिए साथियों, समय रहते ठान लें—मेहनत कोई बोझ नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव है।
समय, सत्य और सनातन चेतना
आज का समय एक विचित्र विरोधाभास से गुजर रहा है। यदि कोई व्यक्ति अपने रास्ते से आता-जाता है, ईमानदारी, सरलता और नैतिकता के साथ जीवन जीता है, तो उसे समाज में अक्सर “पिछड़ा” कह दिया जाता है। वहीं जो दूसरों को दबा ले, छल-प्रपंच से साधारण जनता को अपने अधीन कर ले, झूठ को सत्य और अधर्म को नीति का नाम दे दे—उसे चतुर, सफल और प्रभावशाली माना जाता है। यह दृश्य नया नहीं है, परंतु इसका विस्तार और स्वीकार्यता आज अभूतपूर्व है।
सनातन धर्म का मूल सिद्धांत ही सत्य और न्याय का ब्रह्मांडीय नियम है। ऋग्वेद कहता है—
“सत्यमेव जयते नानृतम्”—अर्थात अंततः सत्य की ही विजय होती है। पर सत्य की यह विजय तात्कालिक नहीं, बल्कि काल की कसौटी पर परखी जाती है। अधर्म अक्सर शोर मचाकर आगे बढ़ता है, जबकि धर्म मौन रहकर टिकाऊ नींव बनाता है।
आज का युग जश्न का है—झूठ पर खड़े साम्राज्यों का, छल से अर्जित वैभव का। लोग समझते हैं कि उन्होंने समय को जीत लिया है। पर सनातन दृष्टि में काल (समय) स्वयं ईश्वर का स्वरूप है—“कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्” (भगवद्गीता)। जो काल को छल सकता है, वह स्वयं को धोखा देता है। समय ठहरता नहीं; वह हिसाब भी रखता है।
आप कितने ही लोगों को भ्रमित कर लें, कितनी ही सीधी-सादी जनता को अपने प्रभाव में ले आएँ—यह सब क्षणिक है। महाभारत का इतिहास गवाह है। दुर्योधन ने शक्ति, संख्या और छल का सहारा लिया। पांडवों को वनवास मिला, उपहास और अपमान सहना पड़ा। समाज की दृष्टि में वे कमजोर थे, पर धर्म उनके साथ था। परिणाम क्या हुआ? कंटीली डालियों में भी फूल खिले। कुरुक्षेत्र में केवल युद्ध नहीं हुआ, वहाँ अधर्म की परतें उघड़ गईं।
आज भी वही नियम लागू है। जब समय पलटता है, तो उजाला चारों ओर फैलता है। तब गुनाहों का पिटारा अपने आप खुलता है। जो स्वयं को अजेय समझते थे, वे औंधे मुँह गिरते हैं। यह पतन किसी प्रतिशोध का नहीं, बल्कि कर्म-सिद्धांत का परिणाम होता है। गीता स्पष्ट कहती है—
“यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः”—जैसा आचरण प्रभावशाली लोग करते हैं, समाज वैसा ही सीखता है। इसलिए उनके कर्मों का प्रभाव भी व्यापक होता है, और उनका दंड भी।
सनातन संस्कृति व्यक्ति को चेताती है कि सफलता का माप दूसरों को दबाना नहीं, बल्कि दूसरों का संबल बनना है। नर सेवा ही नारायण सेवा—यह केवल नारा नहीं, जीवन-दर्शन है। जो सबल है, उसका धर्म है कि वह निर्बल का हाथ थामे। यही कारण है कि हमारे ग्रंथों में दान, करुणा, क्षमा और सत्य को सर्वोच्च गुण माना गया है।
जीवन की अंतिम बेला में कोई यह नहीं पूछता कि आपने कितनों को मात दी, बल्कि यह प्रश्न उठता है कि आपने कितनों को उठाया। अलविदा कहने का क्षण ही असली परीक्षा है। वहाँ न पद काम आता है, न प्रभाव—केवल कर्मों की गठरी खुलती है। यदि जीवन फजीहत से बचाना है, तो आज ही दिशा चुननी होगी।
यह बात किसी को डराने के लिए नहीं, बल्कि जगाने के लिए है। समय का पहिया घूमता है—धीरे, पर अचूक। जो आज हाशिये पर हैं, यदि वे धर्म और धैर्य नहीं छोड़ते, तो कल प्रकाश उनके द्वार आएगा। और जो आज शिखर पर हैं, यदि उन्होंने अधर्म को सीढ़ी बनाया है, तो गिरावट भी उतनी ही तीव्र होगी।
इसलिए साथियों, सनातन का संदेश सरल है—सबल रहते हुए संबल बनो, सफल रहते हुए संवेदनशील बनो। यही जीवन की सच्ची संपत्ति है, और यही वह राह है जो अंततः मनुष्य को पश्चाताप से नहीं, शांति से भर देती है।
जीवन में सुख और दुख दोनों आते रहते हैं। किसी व्यक्ति के जीवन में दुख अधिक आते हैं, और किसी के जीवन में सुख अधिक आते हैं।
“जिसके जीवन में दुख अधिक आते हैं, वह सुख की कीमत समझता है। और जिसके जीवन में सुख अधिक आते हैं, वह दुख के कम आने से सुख की कीमत भी उतनी नहीं समझता।” “जैसे धनवान सेठों के बच्चे पैसे की कीमत अधिक नहीं समझते। और गरीब लोगों के बच्चे धन की कीमत समझते हैं। क्योंकि उन्हें धन बहुत मुश्किल से मिलता है।”
“इसी प्रकार से सुख-दुख की भी बात है। जो लोग सदा सुख साधनों में ही अपना जीवन जीते हैं, कभी धूप में नहीं चलते, कभी नंगे पांव नहीं चलते, कभी कोई परिश्रम वाला कार्य नहीं करते, तो आगे चलकर वे सुख की कीमत भी नहीं समझ पाएंगे। उसका आनंद पूरा नहीं ले पाएंगे। क्योंकि उनके जीवन में दुख बहुत कम आया। वे दुख और सुख की तुलना ठीक से नहीं कर पाए।”
“जीवन का पूरा आनंद लेने के लिए बीच-बीच में कभी-कभी दुख भी आना चाहिए। जैसे छाया की कीमत तभी पता चलती है, जब कभी-कभी धूप में भी पैदल चलना पड़े।”
“इसी प्रकार से यदि जीवन में कुछ कुछ कष्ट आते रहेंगे, तो व्यक्ति उनसे संघर्ष करेगा। और उसे सुख का सही मूल्य समझ में आएगा। उन दुखों को पार करने के बाद, जो उसे सुख मिलेगा, तब वह उस सुख की कीमत भी समझेगा, और तभी उसका जीवन अधिक सुखमय भी हो पाएगा।”
—– “स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात”
















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