महाभारत के विदुर आखिर यमराज के अवतार क्यों थे? – ऋषि मांडव्य का भीषण श्राप!
पौराणकि काल की बात है। एक महान तपस्वी थे—ऋषि मांडव्य। उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि वे अपनी कुटिया के बाहर वृक्ष के नीचे अक्सर गहन समाधि में लीन रहते थे। उनका तेज ऐसा था कि बड़े-बड़े सिद्ध भी उनका सम्मान करते थे।
- आश्रम में हलचल और राजा की भूल
एक दिन ऋषि मांडव्य अपनी कुटिया के बाहर मौन धारण किए तपस्या में लीन थे। तभी वहां शांति भंग हुई। राज्य के कुछ चोर, राजा के खजाने से धन चुराकर भाग रहे थे और सैनिक उनके पीछे लगे थे।
छिपने की कोई जगह न पाकर, चोरों ने ऋषि की कुटिया में प्रवेश किया और चोरी की पोटली वहीं छोड़कर पिछली तरफ से भाग निकले। जब राजसैनिक वहां पहुंचे, तो उन्हें ऋषि समाधि में मिले और पास ही पड़ा था चोरी का धन। सैनिकों ने समझा कि यह साधु ही चोरों का सरदार है जो अब ढोंग कर रहा है।
बिना किसी पूछताछ के, सैनिकों ने ऋषि को गिरफ्तार कर लिया और राजा के सामने पेश किया। राजा ने भी बिना सत्य जाने आदेश दे दिया— “इस अपराधी को सूली पर चढ़ा दिया जाए।”
- मृत्यु भी जिन्हें छू न सकी
राजा के आदेश पर ऋषि मांडव्य को नुकीली सूली (शूल) पर चढ़ा दिया गया। सामान्य मनुष्य होता तो प्राण त्याग देता, लेकिन मांडव्य तो सिद्ध योगी थे। उन्होंने अपने प्राणों को समेटकर योगबल से अपनी रक्षा की।
कई दिनों तक सूली पर लटके रहने के बाद भी जब ऋषि के चेहरे का तेज कम नहीं हुआ और उनके प्राण नहीं निकले, तो यह खबर राजा तक पहुंची। राजा भयभीत हो गए। उन्हें आभास हो गया कि उनसे बहुत बड़ा अनर्थ हो गया है। राजा नंगे पांव दौड़ते हुए आए, ऋषि को सूली से उतरवाया और उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगी।
ऋषि मांडव्य ने शांत भाव से कहा, “राजन! मैं तुम्हें क्षमा करता हूं, क्योंकि तुम्हारे शरीर में वही ईश्वर है जो मुझमें है। परंतु… जिसने मुझे इस निरपराध दंड का विधान दिया है, मैं उसे क्षमा नहीं करूंगा।”
- यमलोक में धर्मराज की अदालत
अपने तपोबल से ऋषि मांडव्य सशरीर यमलोक जा पहुंचे। वहां यमराज (धर्मराज) अपने सिंहासन पर विराजमान थे। ऋषि को क्रोधित देख यमराज भी सहम गए।
ऋषि ने कड़कती आवाज़ में पूछा, “धर्मराज! मैंने अपने जीवन में ऐसा कौन सा पाप किया था, जिसके बदले मुझे सूली पर चढ़ने जैसा भयानक कष्ट भोगना पड़ा?”
यमराज ने चित्रगुप्त की बही-खाते देखे और उत्तर दिया, “महर्षि! जब आप 12 वर्ष के थे, तब आपने खेल-खेल में एक पतंगे (कीड़े) की पूंछ में सींक (नुकीली डंडी) चुभो दी थी। उस जीव को जो कष्ट हुआ, उसी के कर्मफल स्वरूप आपको यह सूली का कष्ट भोगना पड़ा।”
- ऋषि का क्रोध और श्राप
यह सुनते ही ऋषि मांडव्य का क्रोध ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा।
उन्होंने यमराज को ललकारा, “धर्मराज! तुम धर्म के देवता होकर भी धर्म का मर्म भूल गए? शास्त्रों का विधान है कि 12 वर्ष तक के बालक को धर्म और अधर्म का ज्ञान नहीं होता। उस उम्र में अज्ञानता में किए गए पाप का दंड इतना कठोर नहीं हो सकता!”
ऋषि ने अपनी जटाएं खोलीं और जल हाथ में लेकर यमराज को श्राप दिया:
“हे यमराज! तुमने एक अबोध बालक की भूल के लिए एक ब्राह्मण को मृत्युतुल्य कष्ट दिया है। तुमने शास्त्रों के विधान का उल्लंघन किया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें अपने देवलोक से गिरकर मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जाना होगा। तुम्हें एक शुद्र योनि में, एक दासी के गर्भ से जन्म लेना पड़ेगा।”
- फलितार्थ: विदुर का जन्म
ऋषि मांडव्य के इसी श्राप के कारण, धर्मराज यम को महाभारत काल में हस्तिनापुर की एक दासी के गर्भ से जन्म लेना पड़ा। यही बालक आगे चलकर महात्मा विदुर कहलाए।
चूंकि वे स्वयं धर्मराज के अवतार थे, इसलिए दासी पुत्र होने के बावजूद, उनकी ‘विदुर नीति’ और ज्ञान के आगे बड़े-बड़े राजा और महारथी नतमस्तक रहते थे।
















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