आर्यभट//ओह बचपन से रात को सोते नहीं थे,उन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ ‘आर्यभटीय’ को लिखकर पूरा कर दिया था, विश्व का सबसे महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री बने

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आर्यभट भारत के सबसे महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री (Astronomer) थे, जिन्होंने आज से लगभग 1500 साल पहले विज्ञान की दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया। उनका जन्म 476 ईस्वी में कुसुमपुर (आधुनिक पटना, बिहार) में हुआ था।
उन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में अपने महान ग्रंथ ‘आर्यभटीय’ की रचना की थी।
गणित और खगोल विज्ञान में उनका ऐतिहासिक योगदान
शून्य (Zero) की अवधारणा: आर्यभट ने शून्य का आविष्कार किया और दशमलव प्रणाली (Decimal System) की नींव रखी। इसके बिना आधुनिक गणित और कंप्यूटर की कल्पना भी असंभव है।
पाई (π) का सटीक मान: उन्होंने π का मान 3.1416 निकाला, जो आधुनिक गणनाओं के बेहद करीब है।
पृथ्वी की गति: उन्होंने दुनिया में सबसे पहले बताया कि पृथ्वी स्थिर नहीं है, बल्कि वह अपनी धुरी (axis) पर घूमती है, जिससे दिन और रात होते हैं।
ग्रहण का सही कारण: उस दौर में लोग राहु-केतु को ग्रहण का कारण मानते थे। आर्यभट ने वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया कि चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण पृथ्वी और चंद्रमा की परछाई के कारण होते हैं।
साल की सटीक अवधि: उन्होंने गणना की कि एक साल में 365.258 दिन होते हैं, जो आज की आधुनिक वैज्ञानिक गणना के लगभग बराबर है

भारत ने 19 अप्रैल 1975 को जब अपना पहला अंतरिक्ष उपग्रह (Satellite) लॉन्च किया, तो महान वैज्ञानिक को श्रद्धांजलि देने के लिए उसका नाम ‘आर्यभट्ट’ रखा

बचपन से ही आर्यभट आम बच्चों से काफी अलग थे। जहाँ अन्य बच्चे खेल-कूद में व्यस्त रहते थे, वहीं आर्यभट का मन प्रकृति के रहस्यों को समझने में लगा रहता था:
तारों से लगाव: वे अक्सर रातों को जागकर आसमान में टिमटिमाते तारों, चंद्रमा की बदलती कलाओं और ग्रहों की चाल को घंटों निहारते रहते थे। उनके मन में हमेशा यह सवाल उठता था कि ये तारे रात में ही क्यों दिखते हैं और आसमान में कैसे टिके हुए हैं?
गणित में गहरी रुचि: वे बचपन से ही संख्याओं के खेल में बहुत तेज थे। वे पेड़ों के पत्तों, बर्तनों या किसी भी चीज़ को गिनने और उनकी आकृतियों (geometry) को समझने की कोशिश करते थे।

  1. नालंदा विश्वविद्यालय और बचपन की शिक्षा
    जब आर्यभट थोड़े बड़े हुए, तो उनकी असाधारण बुद्धिमत्ता को देखते हुए उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय भेजा गया। नालंदा उस समय दुनिया का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र था।
    असाधारण छात्र: नालंदा के पुस्तकालयों में बैठकर उन्होंने खगोल विज्ञान, गणित और वेदों का गहन अध्ययन किया। उनकी एकाग्रता इतनी अद्भुत थी कि वे गणित की जटिल गणनाओं को अपने दिमाग में ही हल कर लेते थे।
    कम उम्र में बड़ी उपलब्धि: उनकी कुशाग्र बुद्धि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ ‘आर्यभटीय’ को लिखकर पूरा कर दिया था, जिसकी तैयारी और अध्ययन उनके बचपन और किशोरावस्था से ही शुरू हो गया था।