“लालसा जितनी बढ़ेगी, सुख उतना घटेगा” –
लालसा = दुख की जड़: जितनी इच्छा बढ़ेगी, मन उतना ही भटकेगा। आज गाड़ी चाहिए, कल बंगला, परसों राज-पाट। मिलने पर भी सुख नहीं, क्योंकि मन अगली चीज मांगने लगता है।
2. अर्जुन vs दुर्योधन: अर्जुन के पास कृष्ण थे, फिर भी संतोष था। दुर्योधन के पास हस्तिनापुर का राज था, फिर भी लालसा थी – पूरा इंद्रप्रस्थ चाहिए। नतीजा? एक को विजय, दूसरे को विनाश।
संतों की वाणी
“चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह। जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह” – कबीर दास
जिसे कुछ नहीं चाहिए, वही असली राजा है।
1⃣ जीवन में हमेशा एक दूसरे को समझने का प्रयत्न करो, परखने का नहीं
विश्वास में ”विष” भी है और ”आस” भी है
यह स्वयं पर निर्भर करता है कि क्या ग्रहण करना है और क्या छोडना
अच्छी भूमिका,अच्छे लक्ष्य
और अच्छे विचारों
वाले लोगों को
हमेशा याद किया
जाता है,
मन में भी,शब्दों में भी
और….जीवन में भी।
कौवा कोयल की आवाज को दवा तो सकता है परंतु स्वयं मधुर आवाज नहीं निकल सकता उसी तरह दुष्ट व्यक्ति सज्जन को बदनाम तो कर सकता है परंतु सज्जन नहीं बन सकता
लालसा घटाओ, सुख अपने आप बढ़ जाएगा। जय हो












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