श्रीमद्भगवद्गीता
अविनाशी तत्त्व का मार्ग ….
इस मनुष्य योनि में आकर भी आप अपना समय धन का संग्रह करने ओर भोग भोगने में लगा दोगे तो फिर अविनाशी तत्त्व की प्राप्ति कब करोगे ? यह बात खास सोचने की है।
अभी अविनाशी तत्त्व अपने अधिकार में है । वह अविनाशी तत्त्व मिलता है-दूसरों की सेवा करने से, दूसरों का हित चाहने से—
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।
( गीता १२ / ४ )
हमारा लाभ हो जाय – इस स्वार्थ की वृत्ति से हमारा बड़ा नुकसान है। मिलेगा कुछ नहीं और असली लाभ से वंचित रह जायँगे।
हमारी प्रत्येक प्रवृत्ति दूसरों के हित के लिये होनी चाहिये। अपने स्वार्थ की वृत्ति बहुत पतन करने वाली है। परन्तु हरेक काम करने में यही वृत्ति मुख्य रहती है कि मेरे को सुख कैसे हो, लाभ कैसे हो? होना यह चाहिये कि दूसरों को लाभ कैसे हो ? दूसरों का दुःख कैसे दूर हो ? कोई भी काम करें तो ‘मेरे को क्या फायदा होगा’- इसकी जगह यह सोचें कि ‘दूसरों को क्या फायदा होगा’।
जिस काम से दूसरे को लाभ नहीं होगा, वह काम हम नहीं करेंगे। इस प्रकार भाव बदले बिना शान्ति नहीं मिलेगी। आपका उद्देश्य दूसरों का हित करने का होगा तो आपका हित अपने-आप होगा, इसमें सन्देह नहीं है।
आपको अपने निर्वाह की चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। आपके निर्वाह का प्रबन्ध पहले से है। जिस परमात्मा ने जन्म दिया है, उसपर आपका पालन करने की जिम्मेवारी है। सबके हित का भाव रखने से आपकी जो उन्नति होगी, वह स्वार्थ का भाव रखने से नहीं होगी।
















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