मानव मन की अंत,,

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|| स्वर्ग का निर्माण ||

मानव मन की अंतः प्रवृत्तियाँ ही उसके जीवन के स्वर्ग एवं नरक का निर्माण करती हैं। हमारे जीवन का आनंद, हमारे जीवन की शांति और हमारे जीवन की प्रसन्नता ही हमारे जीवन का वास्तविक स्वर्ग है।मरने के बाद स्वर्ग की प्राप्ति से श्रेष्ठ बात जीते जी जीवन में स्वर्ग जैसी परिस्थितियों का निर्माण कर लेना है। सबसे प्रेमपूर्ण व्यवहार रखते हुए, छल, कपट, दंभ रहित परस्पर प्रीति, परस्पर सहयोग एवं सर्व मंगल की कामना में समाविष्ट आनंदपूर्ण जीवन ही स्वर्ग है।

जहाँ पर दूसरों के साथ छल-कपट का व्यवहार किया जाता हो, जहाँ पर नित दूसरों को गिराने की योजनायें बनाईं जाती हों और जहाँ पर ईर्ष्यावश दूसरों की उन्नति में अवरोध उत्पन्न किया जाता हो वह जीवन नरक के ही समान है। नरक अर्थात वह वातावरण जिसका निर्माण हमारी दुष्प्रवृत्तियों और हमारे दुर्गुणों द्वारा होता है और स्वर्ग अर्थात वह वातावरण जिसका निर्माण हमारी सदप्रवृत्तियों व हमारे सदगुणों द्वारा होता है।

हर हर महादेव

        

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