सिर्फ सोच का ही फर्क होता है वरना समस्याएं हमें कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत बनाने आती है।
जब तक मनुष्य के जीवन मे सुख – दुख नहीं आएंगे तब तक मनुष्य को ये एहसास कैसे होगा कि जीवन में क्या सही और क्या ग़लत है।
जीवन की सारी दौड़ केवल अतिरिक्त के लिए है, अतिरिक्त पैसा, अतिरिक्त पहचान, अतिरिक्त शोहरत, अतिरिक्त प्रतिष्ठा, यदि यह अतिरिक्त पाने की लालसा ना हो तो जीवन एकदम सरल है।
अगर अतिरिक्त चाइये तो जिद्द होनी चाहिए हासिल करने की, वरना उम्मीद लगाकर तो हर कोई बैठा है।
इंसान को इतना ज्ञान नहीं होता पाप क्या है , पाप खुद करना या दूसरे के पाप को देख के चुप रहना भी पाप है अगर हम किसी के पाप को देखते हैं, हम भी पाप के भागीदार बन जाते हैं जैसे कि अगर हम किसी को कुछ गलत करते हुए देखते हैं, तो क्या हमारा उस पाप में शामिल होना हो जाता है,,
पितामह भीष्म जैसे महान व्यक्ति ने भी द्रौपदी का अपमान होते देखा, लेकिन चुप रहे। इससे पता चलता है कि चुप रहने का मतलब कभी-कभी गलत को बढ़ावा देना भी हो सकता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं
श्रीकृष्ण की ये बात तो बहुत गहरी है! इसका मतलब है कि अगर हम पाप को रोकने की कोशिश नहीं करते, तो हम भी उस पाप में शामिल हो जाते हैं। और अगर हम आगे बढ़कर पाप को रोकने की कोशिश करते हैं, तो श्रीकृष्ण हमें अपना मानते हैं!
जैसे कि भीष्म पितामह का उदाहरण है, अगर उन्होंने द्रौपदी का अपमान होते देखा और चुप रहे, तो क्या वो श्रीकृष्ण के कहे अनुसार सही थे
भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान था, और उन्होंने श्रीकृष्ण के कहे अनुसार पाप को रोकने की कोशिश नहीं की, इसलिए उन्हें अपने ही बाणों की शय्या पर लिककर बहुत दिन तक मृत्यु का इंतजार करना पड़ा।
श्रीकृष्ण की बात तो बहुत गहरी है, अगर हम पाप को रोकने की कोशिश नहीं करते, तो हमें भी उसके परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। हम अपने दैनिक जीवन में इस बात का ध्यान रखना चाहिए,,
















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