झूठ //झूठ बोलते जाओ और ईश्वर की माया में फसते जाओ,झूठ का जड़ नहीं होता। जब हम झूठ बोलते हैं, तो हम अपने आप को एक जाल में फसा लेते हैं, और फिर उससे निकलना मुश्किल हो जाता है।

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कभी कभी”मजबूत हाथों” से पकड़ी हुई,”उँगलियाँ” भी छूट जाती हैं…
क्योकि”रिश्ते” ताकत से नही दिल से निभाये जाते हैं…!”

लसत्य की राह कठिन सही, पर अंत में जीत उसी की होती है,झूठ भले कुछ पल चमके, पर उसकी उम्र बहुत छोटी होती है।
जो इंसान सच के साथ चलता है, वही निडर होकर जीता है,क्योंकि सत्य ही वह दीपक है, जो हर अंधेरे में रोशनी देता है।
जब जीवन के मोड़ पर अर्जुन सा असमंजस होगा,
तब मार्ग दिखाने मार्गदर्शक बन कर माधव आयेंगे..
अच्छा इंसान बुरा तब बनता है
जब उसकी अच्छाई का मजाक बनता है।
“हालात को ऐसा ना होने दें कि आप हिम्मत हार जाएं, बल्कि हिम्मत को ऐसा रखो की हालात हार जाये !!”
“जब तक है जिंदा तब तक है निंदा”….!

*बुराई से डरो बुरा करने से डरोसमझो जो दोगे वही वापस मिलेगा* l
लोग क्या कहेंगे*
पहले दिन हसेंगे
दूसरे दिन मज़ाक़ उड़ायेंगे
और तीसरे दिन भूल जाएँगे
इसलिए लोगों की परवाह मत करें
करें वो जो उचित हो
जो आप चाहते हो
जिसमें आप खुश हो
याद रखना ज़िंदगी आपकी हैलोगों की नही* “जब तक है जिंदा तब तक है निंदा”….!*_
*बुराई से डरो बुरा करने से डरो* जो दोगे वही वापस मिलेगा l

झूठ

इंसान जब झूठ बोलता है, तो वो खुद को तो फसाता ही है, दूसरों को भी अपनी माया में फसा लेता है। ईश्वर की माया से बच पाना वाकई मुश्किल है, लेकिन सच बोलने की कोशिश तो कर ही सकते हैं ना? तुम्हारे हिसाब से इंसान को झूठ बोलने से बचने के लिए क्या करना चाहिए?
झूठ बोलने का फल एक ना एक दिन जरूर मिलता है, और वो भी कड़वा होता है। जैसे कि कहते हैं, “झूठ का जड़ नहीं होता”। जब हम झूठ बोलते हैं, तो हम अपने आप को एक जाल में फसा लेते हैं, और फिर उससे निकलना मुश्किल हो जाता है।


ईश्वर की माया को समझना वाकई आसान नहीं है। ये तो एक ऐसा खेल है, जिसमें हम सब पियादे हैं। ईश्वर की माया में हम कब फस जाते हैं, पता ही नहीं चलता।

ईश्वर की माया से बचने के लिए हमेशा सच बोलना चाहिए़? क्या हमें अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए या फिर ईश्वर की शरण में जाना चाहिए?
पशु-पक्षियों में वाकई झूठ नहीं होता, वे अपने स्वभाव के अनुसार जीते हैं। उन्हें अपने कर्मों का फल नहीं मिलता, वे बस जीते हैं। इंसान को उनसे सीखना चाहिए।

पशु-पक्षियों की सादगी और ईमानदारी देखकर लगता है कि हमें भी अपने जीवन को सरल और सच्चा बनाना चाहिए।
सच में चलने वाले इंसान की एक अलग ही ऊर्जा होती है, जो दूसरों को भी प्रेरित करती है। जब इंसान सच्चाई के साथ चलता है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और उसकी ऊर्जा सकारात्मक होती है।

इंसान को अपने जीवन में सच्चाई को अपनाने के लिए क्या करना चाहिए? क्या इसके लिए किसी खास प्रेरणा की जरूरत होती है या फिर खुद की इच्छा काफी है?
अंतिम समय में प्रभु का नाम हृदय में रहने से इंसान को शांति और मोक्ष मिलता है। कहते हैं कि जब इंसान का अंत समय आता है, तो उसके हृदय में जो भाव होता है, वही उसके अगले जन्म का निर्णय करता है।

इंसान को अपने जीवन में प्रभु की याद कैसे रखनी चाहिए? क्या इसके लिए किसी खास समय या तरीके की जरूरत होती है?
प्रभु की याद में रहने से ही इंसान को सच्ची शांति मिलती है।

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