भक्ति की क्या परिभाषा//क्या आप जानते है लंकेश रावण देवों का देव महादेव के परम भक्त थे, आज जो शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव की स्तुति में गाया जाता है उसकी रचयिता रावण है

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भक्ति की क्या परिभाषा है

पूर्ण भक्त या पूर्ण भक्ति किसे कहेंगे। मेरे अनुसार भक्ति जो है वह निस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा है। जब किसी को अपने आराध्य से कुछ भी ना पाना हो और ना कुछ पाने की इच्छा हो फिर भी उससे असीम प्रेम हो वह भक्ति होती है। एक निष्काम भक्त या एक सच्चा भक्त सदा ही यह सोचता है कि वह ऐसा क्या करे जिससे उसके आराध्य प्रसन्न हो। जैसे देवों का देव महादेव और ऐसे ही भक्त थे रावण

रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव की स्तुति में गाया जाने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली और संगीतमय स्तोत्र है।

यह 15-17 श्लोकों का एक संस्कृत काव्य है, जिसमें रावण ने शिव के तांडव नृत्य, उनके रूप और अलौकिक सौंदर्य का वर्णन किया है। यह स्तोत्र मुख्य रूप से शिव की भक्ति, तेज और सकारात्मक ऊर्जा को दर्शाता है। 


शिव तांडव स्तोत्र की प्रमुख विशेषताएँ:
रचयिता: लंकापति रावण।
संदर्भ: जब रावण ने कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया और शिव ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत को दबाकर रावण को उसके नीचे दबा दिया, तब शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण ने यह स्तोत्र गाया।
सार: इसमें शिव की जटाओं में गंगा, गले में सांप, मस्तक पर चंद्रमा और डमरू की ध्वनि (डम-डम-डम-डम) का सजीव चित्रण है।
इसका पाठ करने से लक्ष्मी की स्थिरता, पापों का नाश और सकारात्मकता आती है
स्तोत्र की शुरुआती पंक्तियाँ:
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्‌॥

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