महा शिवरात्रि व्रत
समुद्र मंथन से निकले विष को शिव द्वारा पीना (जिससे वे नीलकंठ कहलाए) और भगवान शिव व देवी पार्वती का विवाह प्रमुख हैं,
जो शक्ति और चेतना के मिलन का प्रतीक है, और यह रात ब्रह्मांडीय संतुलन तथा आध्यात्मिक जागृति का उत्सव है। इसके अलावा, एक शिकारी (चित्रभानु) की कथा भी है, जिसने अनजाने में रात भर जागकर और शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाकर शिवरात्रि व्रत का पालन किया और मोक्ष प्राप्त किया।
प्रमुख कथाएँ और महत्व:
शिव-पार्वती विवाह: माना जाता है कि महाशिवरात्रि की रात ही शिव और पार्वती का विवाह हुआ था, जो वैराग्य (शिव) और शक्ति (पार्वती) के मिलन, तथा प्रेम, धैर्य व समर्पण का प्रतीक है, जिससे वैवाहिक जीवन में सौभाग्य आता है।
समुद्र मंथन और नीलकंठ: समुद्र मंथन से निकले घातक विष (हलाहल) को शिव ने सृष्टि को बचाने के लिए पी लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। देवताओं ने रात भर जागकर उनका गुणगान किया, और तभी से यह रात शिव के इस बलिदान और जागृति के उत्सव के रूप में मनाई जाती है।
शिवलिंग का प्राकट्य: शिवपुराण के अनुसार, इसी रात भगवान शिव अपने अनादि-अनंत ‘शिवलिंग’ स्वरूप में प्रकट हुए थे, जो अनंत ऊर्जा और ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक है।
चित्रभानु की कथा (शिकारी): एक शिकारी, चित्रभानु, अनजाने में रात भर शिव की पूजा (बेलपत्र चढ़ाना, जागरण) करता है और अपने पापों का प्रायश्चित करता है, जिससे उसे मोक्ष मिलता है। यह कथा दर्शाती है कि सच्ची श्रद्धा और अनजाने में किए गए अच्छे कर्म भी फल देते हैं।
मुख्य शिक्षा:
महाशिवरात्रि सिर्फ एक रात नहीं, बल्कि यह याद दिलाती है कि जहाँ शिव (चेतना) हैं, वहाँ शक्ति (पार्वती) है, और यह रात अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और सांसारिक मोह पर आध्यात्मिक जागृति की जीत का प्रतीक है, जिसे भक्त व्रत, जप और ध्यान से मनाते हैं।
















Leave a Reply