शिवलिंग की असली कहानी हिंदू पौराणिक कथाओं में ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता के विवाद से जुड़ी है, जहाँ एक अंतहीन अग्नि स्तंभ (ज्योति) प्रकट हुआ;
इसके छोर ढूंढने की कोशिश में ब्रह्मा ने झूठ बोला, जिससे भगवान शिव प्रकट हुए और इस स्तंभ को अपना अनादि-अनंत रूप बताया, जिसे शिवलिंग कहा गया, जो सृष्टि की ऊर्जा और चेतना का प्रतीक है, जिसकी पूजा सृष्टि के आरंभ से होती आ रही है.
उत्पत्ति की पौराणिक कथा (भागवत पुराण के अनुसार)
विवाद: सृष्टि के आरंभ में, भगवान विष्णु और ब्रह्माजी के बीच इस बात पर बहस छिड़ गई कि दोनों में से कौन श्रेष्ठ है.
अग्नि स्तंभ का प्राकट्य: उनके विवाद को सुलझाने के लिए, आकाश से एक विशाल, अंतहीन अग्नि स्तंभ (ज्योति) प्रकट हुआ, जो महादेव का प्रतिनिधित्व करता था.
छोर ढूंढने की चुनौती: एक दिव्य आवाज़ आई कि जो भी इस स्तंभ का अंत ढूंढ लेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा.
ब्रह्मा का झूठ: ब्रह्मा जी ने ऊपर की ओर उड़कर और केतकी के फूल से झूठ बोलकर यह दावा किया कि उन्हें ऊपरी छोर मिल गया है, जबकि विष्णु जी को नीचे की ओर कोई अंत नहीं मिला और उन्होंने हार मान ली.
शिव का प्रकट होना: ब्रह्मा के झूठ पर महादेव अग्नि स्तंभ से प्रकट हुए, उन्होंने ब्रह्मा को श्राप दिया और विष्णु को आशीर्वाद दिया, और बताया कि यह स्तंभ स्वयं उनका निराकार, अनंत रूप है, जिसे शिवलिंग कहते हैं.
शिवलिंग का अर्थ और महत्व
ऊर्जा और चेतना का प्रतीक: शिवलिंग, ‘लिंगम’ (संकेत) और ‘योनि’ (आधार) से मिलकर बना है, जो पुरुष (शिव/चेतना) और स्त्री (शक्ति/ऊर्जा) के मिलन, और समस्त ब्रह्मांड की सृजनात्मक ऊर्जा का प्रतीक है.
निराकार ब्रह्म का रूप: यह भगवान शिव के निराकार, अनंत और रूप रहित स्वरूप का बाह्य प्रतीक है, जिसकी कोई शुरुआत या अंत नहीं है.
वैज्ञानिक पहलू: कुछ विद्वानों का मानना है कि परमाणु रिएक्टरों की नियंत्रण भी हो सकता है
















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