भारतीय दर्शन में माया ईश्वर (ब्रह्म) की एक दिव्य शक्ति है, जिसे संसार और जीव के बीच ‘भ्रम के पर्दे’ के रूप में रचा गया है। माया के कारण ही मनुष्य असत्य (संसारिक बंधन) को सत्य मानने लगता है। यह ईश्वर की लीला है, जो आत्मा को परीक्षा और अनुभव के माध्यम से सत्य की पहचान कराती है।
माया के संदर्भ में मुख्य बातें:
माया का उद्देश्य: माया का निर्माण जीव को संसार में इच्छाओं और स्वतंत्र आनंद का अनुभव कराने के लिए हुआ, जो आध्यात्मिक जगत की एक छाया है।
माया क्या है?: यह एक ऐसी दिव्य शक्ति (पर्दा) है जो हमें सत्य (ईश्वर) से दूर रखती है और असत्य (मायाजाल) में उलझाती है।
मोह और माया: जहाँ माया ईश्वर की रचना है, वहीं ‘मोह’ मनुष्य की कमजोरी है जो उसे इस जाल में और अधिक बाँध देती है।
मुक्ति: सच्चे ज्ञान और ईश्वर की शरण में जाने से ही मनुष्य माया के बंधन से मुक्त (मोक्ष) हो सकता है।
यह एक ऐसी ‘वर्चुअल रियलिटी’ की तरह है, जिसे ईश्वर ने अपनी रचनात्मक शक्ति के रूप में बनाया है, न कि किसी व्यक्ति के रूप में।
मायापति श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति ‘माया’ (वैष्णवी ऐश्वर्यशक्ति) द्वारा इस संपूर्ण जगत के खेल की रचना की है, जो मायाजाल से सभी को मोहित करती है। भगवान का कहना है कि जो कुछ भी दृश्यमान है, वह उनकी माया है, जो जीव को संसार से बांधती है। यह माया सृष्टिकर्ता श्रीकृष्ण की अध्यक्षता में ही काम करती है।
माया और श्रीकृष्ण की अवधारणा:
मूल रचयिता: श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं और जो उनसे भिन्न दीखता है, वह उनकी माया है।
माया क्या है? यह भगवान की एक प्रभावशाली शक्ति है, जो सांसारिक भ्रम पैदा करती है।
माया के कार्य: माया का काम जीव को भौतिक संसार में उलझाना और कृष्ण के प्रति उनकी चेतना को शुद्ध करना है। इसे भगवान की “पुलिस” भी माना जाता है जो जीव को उसके कर्मों के अनुसार नियंत्रित करती है।
उदाहरण: श्रीकृष्ण ने अपनी माया से सुदामा को अपनी मायानगरी का अनुभव कराया था।
मुक्ति: जो कृष्ण की शरण में जाते हैं, उन पर माया का असर नहीं होता।
माया भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य ऊर्जा है, जो भौतिक सृष्टि का मूल आधार है।
















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