गंगा स्नान का मर्म, विश्वास की परीक्षा//देव देव महादेव और जगत जननी माँ पार्वती मानवीय रूप धारण कथा

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गंगा स्नान का मर्म: विश्वास की परीक्षा

हरिद्वार का पावन तट। पतित पावनी माँ गंगा अपने पूरे वेग और कल-कल निनाद के साथ बह रही थीं। घाटों पर श्रद्धालुओं का तांता लगा था। “हर-हर गंगे” और “हर-हर महादेव” के जयकारों से आकाश गूंज रहा था।

स्वयं देवाधिदेव महादेव और जगत जननी माँ पार्वती मानवीय रूप धारण कर इस कोलाहल के बीच भ्रमण कर रहे थे। माँ पार्वती की दृष्टि उन हजारों लोगों पर पड़ी जो गंगा में डुबकी लगाकर बाहर आ रहे थे। उनके शरीर गीले थे, माथे पर चंदन था, और मुख पर मंत्र। किन्तु, माँ पार्वती तो अंतर्यामी थीं; वे मनुष्यों के भीतर झाँक सकती थीं।

उन्होंने बड़े आश्चर्य और वेदना के साथ महादेव से पूछा, “हे

प्राणनाथ! देखिये, सहस्त्रों मनुष्य गंगा में स्नान करके निकल रहे हैं। शास्त्रों में तो गंगा को पापनाशिनी कहा गया है, फिर भी इनके चेहरों पर वो तेज क्यों नहीं है? इनके चित्त अब भी काम, क्रोध, लोभ और पाप से मलिन क्यों दिखाई दे रहे हैं? क्या कलयुग में गंगा का सामर्थ्य क्षीण हो गया है?”

शिवजी मंद-मंद मुस्कुराए और बोले, “प्रिये! गंगा का सामर्थ्य आज भी वही है और अनंत काल तक वही रहेगा। समस्या गंगा में नहीं, स्नान करने वालों में है। इनमें से किसी ने भी वास्तव में ‘गंगा स्नान’ किया ही नहीं है, तो भला पाप कैसे धुलें?”

पार्वती जी ने विस्मित होकर कहा, “आप यह कैसी पहेली बुझा रहे हैं प्रभु? अभी तक इनके वस्त्रों से जल टपक रहा है, शरीर भी नहीं सूखे हैं, और आप कहते हैं इन्होंने स्नान नहीं किया?”

महादेव ने गम्भीर स्वर में कहा, “ये केवल जल में शरीर भिगोकर आए हैं, मन को नहीं डुबोया। चलो, तुम्हें इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देता हूँ।”

अगले दिन, महादेव की लीला से आकाश में घने काले बादल छा गए। मूसलाधार वर्षा होने लगी। हरिद्वार की गलियाँ पानी से लबालब हो गईं और रास्तों पर गहरा, लपटीला कीचड़ जमा हो गया।

एक चौड़े रास्ते के बीचों-बीच एक गहरा गड्ढा था। शिवजी ने लीला रची—वे एक अति वृद्ध, जर्जर और असहाय बूढ़े का रूप धारण कर उस कीचड़ भरे गड्ढे में जा गिरे। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई राहगीर चलते-चलते गिर पड़ा हो और अब निकलने में असमर्थ हो।

माँ पार्वती को उन्होंने एक साधारण, चिंतित स्त्री का रूप दिया और गड्ढे के किनारे बैठा दिया। शिवजी ने उन्हें समझाया, “देवी! तुम्हें केवल इतना करना है कि आने-जाने वालों से सहायता की गुहार लगानी है। कहना कि मेरे वृद्ध पति गिर गए हैं, कोई पुण्यात्मा इन्हें बाहर निकाल दे।”

और फिर शिवजी ने वह शर्त बताई जो इस लीला का सार थी:
“जब भी कोई मुझे निकालने के लिए हाथ बढ़ाए, तो उसे रोककर कहना— ‘भाई! मेरे पति सर्वथा निष्पाप हैं। इन्हें केवल वही व्यक्ति स्पर्श करे जिसने जीवन में कोई पाप न किया हो और जो अभी गंगा स्नान से पूर्णतः पवित्र हो गया हो। यदि कोई पापी इन्हें छुएगा, तो वह उसी क्षण जलकर भस्म हो जाएगा।'”

पार्वती जी ‘तथास्तु’ कहकर किनारे बैठ गईं। गंगा स्नान करके लौटने वालों की भीड़ आनी शुरू हुई। माँ पार्वती ने करुण स्वर में पुकारना शुरू किया, “हे धर्मपरायण जनों! कोई मेरे वृद्ध पति की रक्षा करो! ये इस कीचड़ में फँस गए हैं, कोई पुण्यात्मा इन्हें सहारा दे!”

एक सुंदरी युवती को इस अवस्था में देख कई लोग रुके।

  • कुछ के मन में दया आई, तो कुछ के मन में पाप।
  • कुछ कानून के पचड़े के डर से कतरा कर निकल गए।
  • कुछ ने उपहास किया, “अरे बुढ़िया, मरने दे बुड्ढे को, क्यों रो रही है?”

फिर कुछ सज्जन और धर्मभीरु लोग आगे आए। वे वास्तव में सहायता करना चाहते थे। उन्होंने हाथ बढ़ाया, लेकिन जैसे ही पार्वती जी ने अपनी शर्त रखी— “ठहरिये! यदि आप निष्पाप हैं तभी हाथ लगाइएगा, अन्यथा आप भस्म हो जाएंगे!”—वे ठिठक गए।

उनके कदम पीछे हट गए। वे मन ही मन सोचने लगे:

“हम गंगा तो नहा आए हैं, पर क्या सच में हमारे पाप धुल गए? मैंने कल ही झूठ बोला था… मैंने किसी का दिल दुखाया था। गंगा स्नान तो रस्म है, पर अंदर तो मैं वही हूँ। कहीं सच में भस्म हो गया तो? कौन रिस्क ले?”

सुबह से शाम हो गई। सैकड़ों लोग आए, शर्त सुनी, अपने पापों को याद किया, और मृत्यु के भय से सिर झुकाकर चले गए। किसी को भी अपनी पवित्रता पर, या गंगा की शक्ति पर पूर्ण विश्वास नहीं था।

शिवजी ने कीचड़ से ही मुस्कुराते हुए पार्वती जी की ओर देखा, “देखा उमा? आया कोई सच्चे हृदय वाला?”

संध्या गहराने लगी थी। तभी एक नौजवान, हाथ में लोटा लिए, मस्ती में झूमता हुआ, “हर-हर गंगे!” गाता हुआ वहां से निकला। उसे देख पार्वती जी ने फिर वही गुहार लगाई।

युवक का हृदय करुणा से भर गया। उसने आव देखा न ताव, तुरंत अपना लोटा रखा और वृद्ध को निकालने के लिए गड्ढे में उतरने लगा।
पार्वती जी ने उसे तुरंत रोका, “बेटा रुको! यदि तुम सर्वथा निष्पाप नहीं हो, तो मेरे पति को छूते ही तुम जलकर राख हो जाओगे!”

यह सुनते ही वह युवक जोर से हँसा। उसके चेहरे पर भय की लकीर तक न थी। उसने दृढ़ता और उत्साह के साथ कहा:

“माता! यह आप कैसी शंका कर रही हैं? क्या आपको नहीं दिखता कि मैं अभी-अभी पतित पावनी माँ गंगा की गोद से नहाकर आ रहा हूँ? अरे, गंगा में डुबकी लगाने के बाद भी क्या कोई पाप शेष रह सकता है? गंगाजल का स्पर्श होते ही सारे पाप वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्य के निकलते ही अंधकार! आप निश्चिंत रहें, मैं पवित्र हूँ क्योंकि मैं गंगा पुत्र हूँ!”

इतना कहकर उस युवक ने पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ वृद्ध रूपी शिवजी को अपनी बांहों में भरकर कीचड़ से बाहर खींच लिया।

जैसे ही युवक ने उन्हें बाहर निकाला, शिव और पार्वती ने उसे अपना अधिकारी भक्त समझकर अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप में दर्शन दिए।

शिवजी ने पार्वती जी की ओर देखा और कहा, “प्रिये! सुबह से जितने लोग गुजरे, उनमें से केवल इसी एक ने वास्तव में ‘गंगा स्नान’ किया है। बाकी सब तो केवल शरीर धोकर चले गए।”

दुख और पाप का नाश केवल पानी में डुबकी लगाने से नहीं होता। वह होता है उस अटूट विश्वास से कि “ईश्वर की शरण में आने के बाद मैं शुद्ध हो गया हूँ।” जो लोग बिना श्रद्धा के, केवल दिखावे या रस्म अदायगी के लिए तीर्थ करते हैं, वे वैसे ही लौटते हैं जैसे गए थे। फल उसी को मिलता है, जिसकी भावना में बल होता है।

भोले बाबा की स्तुति:

भोले वंदन आपका, और चरण स्पर्श।

मेरी दुनिया आप हो, प्रभू फर्श से अर्श।।

हे भोले दे दीजिए, हमको ये वरदान।

इंसानों के बीच हम, बने रहें इंसान।।

जैसा है प्रभु आपका, संतोषी परिवार।

वैसा ही कर दो सुखद, मेरा भी घर वार।।

!! हर हर गंगे, हर हर महादेव !!
ॐ नमः शिवाय!

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