तिलक लगाने के बाद चावल के दाने लगाने का रहस्य
यह तो आपने अक्सर देखा ही होगा कि जब घर में कोई त्योहार, विवाह, पूजा या शुभ कार्य होता है, तो उसकी शुरुआत तिलक लगाकर की जाती है। तिलक को शुभ माना जाता है — यह तो सभी जानते हैं।
लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि तिलक लगाने के बाद माथे पर चावल के दाने क्यों लगाए जाते हैं?
अक्सर हम परंपराएँ निभाते हैं, पर उनके पीछे छिपे अर्थ को जानने का प्रयास नहीं करते।
पूजा के समय जब ललाट पर कुमकुम या चंदन का तिलक लगाया जाता है, तो उसके ऊपर अक्षत (कच्चे चावल) अवश्य रखे जाते हैं। इसके पीछे वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और शास्त्रीय तीनों ही कारण हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से, तिलक मस्तिष्क को शांति और शीतलता प्रदान करता है।
शास्त्रों के अनुसार, चावल को हविष्य कहा गया है — अर्थात ऐसा शुद्ध अन्न जो हवन व देव पूजन में देवताओं को अर्पित किया जाता है।
चावल का एक नाम अक्षत भी है, जिसका अर्थ होता है —
जिसका कभी क्षय न हो,
जो सदा पूर्ण रहे।
इसी कारण हर शुभ कार्य में चावल का प्रयोग अनिवार्य माना गया है। मान्यता है कि कच्चे चावल व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं, इसलिए पूजा में न केवल तिलक के साथ, बल्कि संपूर्ण विधि में चावलों का उपयोग होता है।
आपने देखा होगा कि पूजा में तिलक, पुष्प, मिठाई और चावल अवश्य होते हैं, क्योंकि चावल के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।
कुमकुम के तिलक के ऊपर चावल लगाने का उद्देश्य यह भी होता है कि हमारे आसपास की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होकर सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाए।
इसलिए यदि कोई केवल तिलक लगाता है और चावल नहीं लगाता, तो शास्त्रीय दृष्टि से यह पूजा की पूर्णता नहीं मानी जाती। ऐसा करने से सकारात्मक ऊर्जा का पूर्ण संचार नहीं हो पाता।
अब आप समझ गए होंगे कि तिलक के साथ चावल क्यों लगाए जाते हैं और क्यों हर पूजा में उनका विशेष महत्व है।
तिलक लगवाते समय सिर पर हाथ क्यों रखते हैं?
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार बिना तिलक के कोई भी पूजा या प्रार्थना पूर्ण नहीं होती। सूना मस्तक अशुभ और असुरक्षित माना गया है।
लेकिन तिलक लगवाते समय सिर पर हाथ रखना — इसके पीछे भी गहरा रहस्य छिपा है।
धर्मशास्त्रों के अनुसार विभिन्न उँगलियों का अलग-अलग प्रभाव होता है —
अनामिका शांति प्रदान करती है
मध्यमा आयु वृद्धि करती है
अंगूठा प्रभाव, यश और आरोग्य देता है
तर्जनी मोक्ष प्रदान करने वाली मानी गई है
इसी कारण राजतिलक और विजय तिलक अंगूठे से ही किया जाता है।
अनामिका सूर्य पर्वत की अधिष्ठाता उँगली है और सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है — जो तेज, सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतीक है।
अंगूठा शुक्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है, जो जीवन शक्ति, सौम्यता और सृजन का कारक है।
मान्यता है कि जब इन उँगलियों से तिलक किया जाता है, तो आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र सक्रिय हो जाते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह पूरे शरीर में होता है।
इसी कारण तिलक लगवाते समय सिर पर हाथ रखना आवश्यक माना गया है।
मन्दिर में दर्शन के बाद बाहर सीढ़ी पर थोड़ी देर क्यों बैठा जाता है?
बुजुर्गों ने सदा कहा है कि दर्शन के बाद मन्दिर की पैड़ी पर कुछ समय अवश्य बैठना चाहिए।
यह कोई साधारण परंपरा नहीं, बल्कि एक अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक विधि है।
वास्तव में मंदिर से बाहर आकर बैठते समय यह श्लोक बोला जाता है —
अनायासेन मरणम्,
बिना दैन्येन जीवनम्।
देहान्ते तव सानिध्यम्,
देहि मे परमेश्वरम्॥
अर्थ —
बिना कष्ट के मृत्यु हो
परवशता रहित जीवन मिले
मृत्यु के समय भगवान का सान्निध्य प्राप्त हो
हे प्रभु, ऐसा वरदान दीजिए
यह प्रार्थना है, याचना नहीं।
घर, धन, पुत्र, व्यापार जैसी वस्तुएँ नहीं माँगनी चाहिए — क्योंकि ये भगवान हमारी पात्रता अनुसार स्वयं देते हैं।
मंदिर में आंखें खोलकर दर्शन करें, भगवान के स्वरूप, चरण, मुखारविंद और श्रृंगार को निहारें।
दर्शन के बाद बाहर आकर नेत्र बंद करके उन्हीं दर्शनों का ध्यान करें।
यदि ध्यान में स्वरूप न आए — तो पुनः मंदिर में जाकर दर्शन करें।
@दैनिक पंचांग
















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