स्वभावं न जहात्येव
साधुरापद्गतोऽपि सन् ।
कर्पूरः पावकस्पृष्टः
सौरभं लभतेतराम् ॥
भावार्थ:
सज्जन पुरुष विपत्ति पड़ने पर भी अपने सुस्वभाव को नहीं त्यागते जिस प्रकार आग का स्पर्श होने से जलकर नष्ट होने पर भी कपूर सुगन्ध ही प्रदान करता हैं ।
महाकवि वेदभाष्यकार महामहोपाध्याय स्मृतिशेष डॉ देवीसहाय पाण्डेय ‘दीप’ जी की उत्कृष्ट हिन्दी रचनाएँ –
इस तरह से मुझे वे सताते रहे
मैं निवेदन करूँ किस तरह से इसे,
जिस तरह से मुझे वे सताते रहे।।
तीर पर तीर बढ़कर चलाते रहे,
घाव पर घाव निशिदिन बनाते रहे।
प्रेम के पंथ पर हाथ मेरा पकड़,
साथ लाये वही, यह सही बात है;
पर, नहीं चल सके एक डग साथ में,
रास्ता दूर से ही बताते रहे॥
पूर्ण विश्वास करता रहा हर तरह,
स्वप्न में भी नहीं दोष उनका दिया;
मैं दवा मान कर चल रहा था जिन्हें,
पीर वे ही निरन्तर बढ़ाते रहे॥
दीप जलता रहा ज्वाल-माला पहन,
और अङ्गार उर से लगाये रहा;
मात्र आलोक से था प्रयोजन उन्हें,
रात भर बेधड़क वे जलाते रहे॥
अब निवेदन तथा अश्रु को छोड़कर
और कुछ भी नहीं रह सका शेष है,
अश्रु-बोझिल पलक-पात्र से रात-दिन,
मोतियाँ हम निरन्तर लुटाते रहे॥
- डॉ देवीसहाय पाण्डेय 'दीप'
(निर्झरिणी काव्य-संग्रह से)
















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