- आज का श्रीमद् भागवत भाव
भागवत कहती है , कि भगवत् प्राप्ति साधनों से नहीं , बल्कि उन्हीं परमात्मा की कृपा से तब होती है , जब जीव के हृदय में उनके प्रति अगाध श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है । क्योंकि फिर उसके हृदय में उनसे मिलने की सच्ची लगन पैदा हो जाती है । साधन तो बहुतों ने बंगलों , गाडी और Bank Balance के रूप में अनेक धामों में इकट्ठे किये हुए हैं , लेकिन हृदय में प्रभु मिलन की सच्ची ललक पैदा नहीं कर पाने के कारण , वे साधन सम्पन्न लोग सभागे नहीं , अभागे बनकर ही रह गए । इसलिये कहा जाता है , कि प्रभु मिलन की ललक के लिए कथा-सत्संगों को ही सबसे बड़ा साधन बनाना चाहिए । 👉 नन्हा बालक कोई साधन नहीं करता । लेकिन उसकी ललक हमेशा अपनी माँ से मिलने की बनी रहती है , तो वह अपनी माँ के लिए ही तो रोता है , माँ के लिए ही तडपता है , तो उसकी यह ललक माँ को मजबूर कर देती है , कि वह उसे अपने दोनों हाथ फैलाकर अपने आँचल में छुपाले । उसी तरह यदि साधक के हृदय में प्रभु मिलन की तीव्र उत्कंठा जागृत हो जाय , तो उसके अंदर शरणागति भाव का जग जाना स्वाभाविक है , फिर प्रभु भी अपने भक्त से क्यों दूरी बनाकर रखेंगे ? अरे ! वे तो माँ की भी माँ हैं ।
👉 संसारी जीव सुख तो चाहता है , लेकिन यह जानता नहीं , कि सुख कहते किसे हैं । उसने तो केवल धन से प्राप्त सुविधाओं को ही सुख मान लिया होता है । जबकि धन से प्राप्त सुविधा , सुख नहीं , बल्कि सुखानुभूति होते हैं । सच्चा सुख तो आत्मिक शांति है , जिसके लिये सुविधाओं की नहीं , बल्कि शरणागति युक्त साधना की आवश्यकता होती है । भागवत में आत्मानंद में गोते लगाने वाले को सच्चासुखी माना गया है , सुविधाओं के सहारे विषयानंद में गोते लगाने वाले मनुष्यों को सच्चा सुखी नहीं ।
( भाई रामगोपालानन्द गोयल ” रोटीराम “)
ऋषिकेश 9412588877 , 91 1832 1832
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