यदि आप अपने गृहस्थ जीवन को सुखमय बनाना चाहते हैं, तो स्त्री और पुरुष दोनों पक्षों को परिश्रम करना होगा।

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“यदि आप अपने गृहस्थ जीवन को सुखमय बनाना चाहते हैं, तो स्त्री और पुरुष दोनों पक्षों को परिश्रम करना होगा।”
“केवल पुरुष ही पुरुषार्थ करता रहे। धन कमाकर पत्नी को सुख देता रहे, केवल इतने से गृहस्थ जीवन सुखी नहीं बन पाएगा। स्त्रियों को भी अपने पति का सम्मान करना होगा। वेदानुकूल उसके आदेश निर्देश का पालन करना होगा। पति के साथ सभ्यता पूर्वक मीठी भाषा का प्रयोग करना होगा। जैसे माता सीता जी अपने पतिदेव श्री रामचंद्र जी महाराज का सम्मान करती थी।”
आजकल अधिकतर ऐसा देखा जाता है, कि “पति-पत्नी दोनों स्वार्थी बनकर केवल अपने ही सुख के विषय में सोचते हैं। दूसरे की भावनाओं और पुरुषार्थ पर ध्यान कम देते हैं। ऐसे तो गृहस्थ आश्रम को सुखमय नहीं बनाया जा सकता।” “जैसे कि पुरुष अपनी पत्नी को छोड़कर अन्य स्त्रियों की और आकर्षित होते हैं। यह ठीक नहीं है।” “इसी प्रकार से स्त्रियां भी अपने रूप सौन्दर्य और बुद्धि के मिथ्या अभिमान में आकर पतियों का अपमान करती हैं। पति कितना भी पढ़ा लिखा बुद्धिमान आई ए एस अफसर, आई पी एस अफसर, बैंक अधिकारी, इंजीनियर, पायलट, वकील , न्यायाधीश आदि क्यों न हो, आजकल स्त्रियां अपने पतियों को ऐसी कठोर भाषा बोलती हैं, “तुम्हें तो जरा भी अक्ल नहीं है.” “अपने पढ़े लिखे बुद्धिमान विद्वान पति के साथ इस तरह की असभ्य भाषा का प्रयोग करना उचित नहीं है। इससे पति-पत्नी का आपस में प्रेम संगठन और विश्वास नहीं बन पाएगा। इसका परिणाम यह होगा कि आप को गृहस्थ जीवन में सुख नहीं मिलेगा। भले ही आप दुनिया को दिखाते रहें, कि हम दोनों बड़े सुखी हैं। ऐसे झूठे प्रदर्शन से गृहस्थ आश्रम में वास्तव में सुख नहीं होता।” “इसलिए पति-पत्नी दोनों को सभ्यता पूर्वक परस्पर व्यवहार करना चाहिए। एक दूसरे की सहमति के बिना कोई काम न करें। तभी आपके गृहस्थ जीवन में सुख होगा।”
“पति-पत्नी दोनों मिलकर वही काम करें, जो वेद आदि शास्त्रों में बताए गए हैं। जैसे सेवा नम्रता परस्पर प्रेम समर्पण एक दूसरे पर विश्वास ईश्वर की उपासना प्रतिदिन घर में यज्ञ करना सब काम बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता से करना आदि। इन सब कार्यों को करते हुए गृहस्थ आश्रम को स्वर्ग बनाया जा सकता है। इसके विरुद्ध आचरण करके नहीं।” “जैसे स्वार्थी बनकर कार्य करना। दूसरे की सुख सुविधा पर ध्यान नहीं देना। छल कपट झूठ धोखाधड़ी बेईमानी हेरा फेरी चरित्र हीनता आदि वेद विरुद्ध आचरण करना।”
“अतः झूठ छल कपट आदि वेद विरुद्ध आचरण को छोड़कर, शुद्ध मन से पति-पत्नी दोनों एक दूसरे पर विश्वास करके वेदानुकूल आचरण करें, और अपने गृहस्थ आश्रम को सुखमय बनाएं।”
—- “स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक – दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात.”

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