कालसर्प दोष//जीवन को मुख्य रूप से तीन अवस्थाओं (बचपन, जवानी, बुढ़ापा) या दार्शनिक दृष्टिकोण (जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति) में बांटा जा सकता है, लेकिन जीवन में कालसर्प पीड़ा को कैसे जानेंगे,,

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जीवन को मुख्य रूप से तीन अवस्थाओं (बचपन, जवानी, बुढ़ापा) या दार्शनिक दृष्टिकोण (जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति) में बांटा जा सकता है, जबकि हिन्दू धर्म में चार आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) होते हैं, और मानव विकास में भी कई चरण होते हैं, जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर।
सामान्यतः जीवन के तीन प्रमुख चरण (भौतिक)
बचपन (Childhood): जन्म से लेकर लगभग 12-13 साल तक, जिसमें शारीरिक और मानसिक विकास होता है और व्यक्ति सीखता है।
जवानी/युवावस्था (Youth/Adulthood): लगभग 18 से 40-60 साल तक, जिसमें व्यक्ति करियर बनाता है, परिवार बसाता है और जिम्मेदारियां निभाता है।
बुढ़ापा (Old Age): 60 के बाद का समय, जिसमें व्यक्ति अनुभव साझा करता है और जीवन के अंतिम पड़ाव पर होता है।
दार्शनिक/आध्यात्मिक दृष्टिकोण
तीन अवस्थाएँ (जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति): ये चेतना की अवस्थाएँ हैं, जहाँ जागृत (जागना), स्वप्न (सपने देखना), और सुषुप्ति (गहरी नींद) शामिल हैं, साथ ही तुरीय (परम चेतना) चौथी अवस्था है।
हिन्दू आश्रम (चार चरण): ब्रह्मचर्य (विद्यार्थी), गृहस्थ (परिवारिक जीवन), वानप्रस्थ (वनवास/रिटायरमेंट), और संन्यास (त्याग)।
मानव विकास के क्षेत्र
स्वास्थ्य और पोषण (Health & Nutrition)
शिक्षा (Education)
जीवन स्तर (Living Standards)
संक्षेप में, ‘जीवन के तीन स्टेज’ का मतलब संदर्भ के अनुसार बदल सकता है, लेकिन आमतौर पर यह बचपन, युवावस्था और बुढ़ापे से जुड़ा होता है।
कालसर्प दोष (Kaal Sarp Dosh) ज्योतिष में एक विशेष योग है जो तब बनता है जब किसी व्यक्ति की कुंडली (जन्म-पंचांग) में सभी ग्रह (सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि) छाया ग्रहों राहु और केतु के बीच फंस जाते हैं, जिससे व्यक्ति के जीवन में संघर्ष, करियर में रुकावट, मानसिक तनाव और स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें आती हैं, जिसे पूर्व जन्म के कर्मों का फल भी माना जाता है, हालांकि कुछ ज्योतिषी इसे वास्तविक दोष नहीं मानते और इसे राहु के प्रभाव का ही एक रूप बताते हैं।  

कालसर्प योग क्या है?

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परिभाषा: जब राहु और केतु के एक तरफ (या तो एक तरफ या दूसरी तरफ) सभी सात प्रमुख ग्रह आ जाते हैं, तब यह योग बनता है। 
‘काल’ और ‘सर्प’: राहु को ‘काल’ और केतु को ‘सर्प’ कहा जाता है, इसलिए इस योग को कालसर्प योग कहते हैं। 
प्रभाव: इसे जीवन में बाधाओं, असफलता और संघर्ष का कारण माना जाता है, जैसे कोई आपको पीछे से पकड़े हुए है। 
मुख्य प्रकार
अनंत (Anant): राहु पहले भाव में और केतु सातवें भाव में हो।
कुलिक (Kulik): राहु दूसरे भाव में और केतु आठवें भाव में हो।
वासुकी (Vasuki): राहु तीसरे भाव में और केतु नौवें भाव में हो।
शंखचूड़ (Shankhchud) (शंखपाल)।
तक्षक (Takshak)।
पद्म (Padma) (पद्म)।
कर्कोटक (Karkotak) (करकोटक)।
शंखनाद (Shankhnad) (शंखनाद)।
घटक (Ghatak) (घटक)।
विषाधर (Vishadhar) (विषाधर)।
शेषनाग (Sheshnag) (शेषनाग)।
पद्मनाग (Padmanag) (पद्मनाग)। 
लक्षण (संभावित)
सपने में सांप देखना, सांपों से डसना या रेंगना।
अकेलापन महसूस करना, तनाव, अवसाद।
करियर और आर्थिक मामलों में रुकावटें, प्रमोशन न मिलना।
नींद में खलल, बार-बार आंखें खुलना।
विवाह और पारिवारिक जीवन में समस्याएं। 
निवारण (मान्यतानुसार)
महामृत्युंजय मंत्र और हनुमान चालीसा का जाप। 
शिवलिंग पर रुद्राभिषेक कराना, खासकर प्रदोष तिथि पर। 
त्र्यंबकेश्वर जैसे पवित्र स्थानों पर कालसर्प दोष निवारण पूजा कराना। 
मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की पूजा, च

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