यदि अपने ज्ञानका आप स्वयं आदर करें तो आप जीवन्मुक्त हो जायँगे। जो जीते ही मर जाता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है। जीते ही मरनेका अर्थ है-कामना छोड़ देना।

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 विचार संजीवनी

 अशांति का कारण.

मृत्युका दुःख नहीं होता, प्रत्युत ‘मैं जीता रहूँ और मरना पड़ता है’- इसका दुःख होता है। बालकसे जवान होनेका दुःख होता है क्या ?

यदि अपने ज्ञानका आप स्वयं आदर करें तो आप जीवन्मुक्त हो जायँगे। जो जीते ही मर जाता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है। जीते ही मरनेका अर्थ है-कामना छोड़ देना। मरा हुआ आदमी कोई कामना करता है क्या ? जो मरनेसे डरता नहीं और जीनेकी आशा नहीं रखता, वह जीवन्मुक्त हो जाता है।

जीनेकी आशा न रखें तो मृत्युका दुःख नहीं होगा। ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये-यही अशान्तिका कारण है।

परम् श्रद्धेय स्वामी जी श्रीरामसुखदास जी महाराज साधन-सुधा-निधि पृष्ठ ५८४ (द्वितीय संस्करण)