सच्चाई स्वीकार करना: जब सत्यकाम विद्या ग्रहण करने के लिए महर्षि गौतम (हरिद्रुमत गौतम) के पास गए, तो ऋषि ने उनका गोत्र और पिता का नाम पूछा।
माँ का जवाब: सत्यकाम ने घर आकर अपनी माँ जबाला से पूछा। माँ ने बहुत ही ईमानदारी से बताया कि जवानी के दिनों में वह कई घरों में काम करती थीं और उन्हें यह ज्ञात नहीं है कि सत्यकाम का असली पिता कौन है।
गुरु के समक्ष सत्य बोलना: सत्यकाम ने बिना किसी झिझक या छिपाव के ऋषि गौतम को ज्यों-का-त्यों सच बता दिया कि उसकी माँ को उसके पिता का नाम नहीं पता है, और उसकी माँ का नाम ‘जबाला’ है।
गौतम ऋषि का निर्णय: सत्यकाम की इस अद्भुत सत्यवादिता और साहस को देखकर महर्षि गौतम बेहद प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि “इतनी स्पष्टता और सत्य बोलने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं, बल्कि सच्चा ब्राह्मण ही हो सकता है”।

इसलिए, गौतम ऋषि ने सत्यकाम को अपना शिष्य स्वीकार कर लिया और उन्हें अपनी माँ के नाम पर ‘सत्यकाम जाबाल’ नाम दिया।











