हिन्दी फ़िल्मों के महान फिल्म निर्देशक बिमल राय…
विमल रॉय : सिनेमा के ऋषि : जन्मदिवस विशेष – 12 जुलाई 1909
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“कैमरा झूठ नहीं बोलता, और जो झूठ न बोले वही सिनेमा है” – ये सिर्फ एक लाइन नहीं, ये विमल रॉय का पूरा जीवन-दर्शन था…
आज से 116 साल पहले 12 जुलाई 1909 को बंगाल के सुग्रामपुर में जन्मे विमल रॉय ने हिन्दी सिनेमा को वो आईना दिया, जिसमें आम आदमी अपना चेहरा देखकर रो भी सकता था और गर्व भी कर सकता था…
गाॅंव से ग्लैमर तक की यात्रा: विमल रॉय का बचपन बंगाल के खेतों और नदियों के बीच बीता… फोटोग्राफी से शुरू हुआ सफर धीरे-धीरे निर्देशन तक पहुॅंचा… “उदयर डाक” और “अंजली” जैसी बंगाली फिल्मों के बाद वो बंबई आए, पर बंबई की चमक-दमक ने उन्हें कभी नहीं लुभाया…
उनका मानना था – “सिनेमा मनोरंजन का साधन नहीं, समाज को बदलने का हथियार है…!”
उनकी फिल्में : समाज का आईना : विमल रॉय ने ऐसी फिल्में बनाईं जो आज भी दिल को झकझोर देती हैं :~
1. दो बीघा ज़मीन – (1953)
एक किसान की जमीन बचाने की जद्दोजहद… कोलकाता की गलियों में रिक्शा खींचता बाप… ये फिल्म सिर्फ कहानी नहीं थी, ये आजादी के बाद के भारत की सच्चाई थी.. कान्स में पुरस्कृत हुई…!
2. मधुमती – (1958)
पुनर्जन्म, रहस्य और प्रेम… दिलीप कुमार – वैजयंतीमाला की ये फिल्म आज भी सस्पेंस थ्रिलर का बेंचमार्क है… 9 फिल्म फेयर अवॉर्ड…!
3. सुजाता – (1959)
जाति-भेद पर करारा प्रहार… “नदिया चले नदिया” गीत के साथ समाज को आईना दिखाया…!
4. बंदिनी – (1963)
एक जेल में बन्द औरत की कहानी… पर, असल में ये स्त्री की आजादी की कहानी थी… नूतन का अभिनय आज भी मिसाल है…!
5. परख [🎭] बिराज-बहू [🎭] देवदास [🎭] :~
हर फिल्म में एक नया विषय, एक नया दर्द.. नाटक…!
💡 विमल रॉय की 3 सबसे बड़ी सीखें… 💡
1. दिखावा नहीं, सच दिखाओ…
उनके सेट पर कोई नकली महल नहीं बनता था… असली झोपड़ियाँ, असली खेत, असली ऑंसू… वो कहते थे – “दर्शक बेवकूफ नहीं है, वो सच पहचान लेता है…!”
2. गीत कथा को आगे बढ़ाऍं…
“रेणुका”, “मोहे पनघट पे”, “ओ सजना बरखा बहार” – उनके गाने सिर्फ हिट नहीं थे बल्कि, वो कहानी का हिस्सा थे…!
3. अभिनेता नहीं, किरदार बनाओ…
नूतन, बलराज साहनी, दिलीप कुमार – सबने विमल रॉय की फिल्मों में अपना सर्वश्रेष्ठ दिया.. क्योंकि, वो उन्हें “स्टार” नहीं, “इंसान” बनाते थे…!
😔 आज विमल रॉय की जरूरत क्यों..?? 😔
आज सिनेमा 100 करोड़, 500 करोड़ की दौड़ में है… VFX है.. आइटम सॉन्ग है… लेकिन,आत्मा गायब है…!
विमल रॉय हमें याद दिलाते हैं कि, सिनेमा का काम सिर्फ टिकट बेचना नहीं है….
सिनेमा का काम समाज को जगाना है.. गरीब का दर्द दिखाना है.. औरत की इज्जत की बात करना है…!
उन्होंने 1966 में ये दुनिया छोड़ दी… किन्तु उनकी फिल्में आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं…!
विमल रॉय ने एक बार कहा था ~
“मैं कैमरे से उपदेश नहीं देना चाहता.. मैं सिर्फ वो दिखाना चाहता हूंँ जो मैंने अपनी ऑंखों से देखा है..!”
आज उनके जन्मदिन पर हम संकल्प लें….
सिनेमा को फिर से “कला” बनाऍं, “बिजनेस” नहीं…
कहानी को पुनः “दिल” से जोड़ें, “ट्रेंड” से नहीं..!
विमल रॉय सिर्फ निर्देशक नहीं थे…
वो उस दौर के ऋषि थे, जिन्होंने 35mm की पट्टी पर भारत का सच लिख दिया…!
।। शत-शत नमन ।।












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