संस्कृत // शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक लाभों का पुनः स्थापन वर्तमान शैक्षणिक परिदृश्य की एक अनिवार्य आवश्यकता है।

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केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय यह मानता है कि उपनिवेशवाद (Colonization) ने भारतीय भाषा, संस्कृति, शासन-प्रणाली, शिक्षा-व्यवस्था तथा शोध-परम्पराओं पर गहरे और दीर्घकालिक दुष्प्रभाव डाले हैं। इन प्रभावों का सम्यक् बौद्धिक मूल्यांकन तथा उपनिवेश-मुक्ति (Decolonization) से प्राप्त होने वाले वैचारिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक लाभों का पुनः स्थापन वर्तमान शैक्षणिक परिदृश्य की एक अनिवार्य आवश्यकता है।

विश्वविद्यालय की यह स्पष्ट नीति है कि संस्कृत के विद्यार्थी एवं शोधार्थी भाषा, संस्कृति, शासन, ज्ञान-परम्परा तथा अनुसन्धान-पद्धतियों के क्षेत्र में उपनिवेशवाद के प्रभावों का गहन अध्ययन करें तथा भारतीय दृष्टिकोण से उनके विकल्पों का विकास करें। इस उद्देश्य से संस्कृत-आधारित विमर्श, अनुसंधान, ग्रन्थ-लेखन एवं बहुविषयक अध्ययन को प्रोत्साहित किया जाएगा।

नीति के अंतर्गत यह अपेक्षा की जाती है कि शोधार्थी उपनिवेश-मुक्ति के प्रभावों का ऐतिहासिक, दार्शनिक, भाषिक एवं शैक्षणिक स्तर पर परीक्षण करें तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा के आलोक में नवीन अनुसंधान-मॉडल प्रस्तुत करें। इस प्रक्रिया में संस्कृत ग्रन्थों, परम्परागत बौद्धिक स्रोतों तथा आधुनिक अकादमिक उपकरणों का समन्वय किया जाएगा।

यह नीतिगत पहल संस्कृत अध्ययन एवं शोध के क्षेत्र में नवाचार को सुदृढ़ करेगी तथा भारतीय बौद्धिक स्वाधीनता, आत्मबोध और ज्ञान-स्वराज के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगी।

— प्रो. श्रीनिवास वरखेडी
कुलपति
केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय

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